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पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती ) सूत्र
लिय सरीरेहिंतो कइ किरिया ? गोयमा ! तिकिरियावि, चउकिरियावि, पंचकिरियावि. है एवं जाव वेमाणिया णवरं मणुस्सा जहा जीवा ॥ १५ ॥ जीवेणं भंते ! वेउब्विय
सरीराओ कइ किरिए ? गोयमा! सिय तिकिरिए, सिय चउकिरिए, सिय अकिरिए ॥ नेरइएणं भंते ! वेउब्विय सरीराओ कइकिरिए ? गोयमा! सिय तिकिरिए सिय चउकिरिए,एवं जाव वेमाणिए,णवरं मणुस्से जहा जीवे,एवं जहा ओरालिय सरीरेणं चत्तारि
दंडगा तहा भाणियव्वा॥णवरं पंचम किरिया न भण्णइ सेसं तंचव एवं जहावेउब्वियं अहो गौतम ! उदारिक शरीर से नारकी को तीन चार व पांच क्रियाओं लगे ऐसे ही वैमानिकतक जानना. मनुष्य का समुच्चय जीव जैसे कहना ॥ १५ ॥ अहो भगवन् ! जीव को वैक्रेय शरीर से कितनी क्रियाओं है लगे? अहो गौतम ! क्वचित् तीन क्वचित् चार क्रियाओं लंग और क्वचित् आक्रिय भी होवे. इस में पांच क्रियाओं नहीं लगती हैं क्योंकि वैक्रेय शरीर का घात नहीं होता है. नरक, देव व उत्तम पुरुष नोपकर्म आयुष्य बांधते हैं और वे आयुष्य पूर्ण हुए विना किसी से नहीं मारे जा सकते हैं. अहो.. भगवन् ! नारकी को वैकेय शरीर से कितनी क्रियाओं लगे ? अहो गौतम ! क्वचित् तीन क्वचित् चार क्रियाओं लगती हैं. नारकी जैसे मनुष्य छोडकर वैमानिक तक सब दंडक का जानना. जैसे उदारिक शरीर के चार दंडक कहे वैसे ही वैक्रेय शरीर के एक जीव एक वैक्रेय शरीर, एक जीव बहुत है।
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भावार्थ
*3886-.आठवा शतकका छठा उद्देशा
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