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________________ ऋषिजी + २०४४ 48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमालक ते मइअण्णाणी, सुय अण्णाणी, विभंगणाणी॥ ८ ॥ नेरइयाणं भंते ! कि गाणी अण्णाणी ? गोयमा ! णाणावि अण्णाणीवि; जेणाणी ते नियमा तिण्णाणी, तंजहा आभिणिारोहियणाणी, सुयणाणी, ओहिणाणी, जे अण्णाणी ते अत्थेगइया दुअण्णाणी, अत्थेगइया तिअण्णाणी. एवं तिाण अण्णाणाई भयणाए ॥ असुरकुमाराणं भंते ! किं णाणी अण्णाणी? जहेव नेरइया तहेव तिण्णि णाणाणि नियमा, तिाण अण्णाणाणि भयणा ए, एवं जाव थाणियकुमारा ॥पुढविकाइयाणं भंते! किं णाणी अण्णाणी? गोयमा !नो णाणी दो अज्ञानवाले और किननक मति, श्रुत व विभंग ऐसे तीन अज्ञान वाले हैं ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! क्या नारकी ज्ञानी या अज्ञानी हैं ? अहो गौतम [ नारकी ज्ञानी व अज्ञानी दोनों हैं जो. ज्ञानी हैं वे निश्चय ही मति श्रुत व ओध ऐसे तीन ज्ञान वाले हैं और जो अज्ञानी हैं वे कितनेक मति व श्रुत ऐसे दो अज्ञान वाले हैं और कितनेक मति श्रुत अज्ञान व विभंग ज्ञान ऐमें तीन अज्ञान वाले हैं ऐसे ही असुरकुमारादि दश भग्नपति में तीन ज्ञान की नियमा व तीन अज्ञान की भजमा हैं पृथ्वीकायिकादि । पांच स्थावर में ज्ञान नहीं है मात्र मति अज्ञान व श्रुत अज्ञान की नियमा है बेइन्द्रिय तेइन्द्रिय व चतुरेन्द्रिय ज्ञानी व अज्ञानी है. जो ज्ञानी हैं वे निश्चयही मति व श्रुत झान वाले हैं और जो अज्ञानी हैं वे निश्चयही मति व श्रुत अज्ञान वाले हैं. तियेच पंचेन्द्रिय मानी व अज्ञानी प्रकाइक-राजाबहादुर लाला दसहायजी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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