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________________ श्री अष्टोत्तरी व शान्तिस्नात्रादि विधि ॥८२ ॥ ॐ भवणवइवाणवंतर-जोइसवासी विमाणवासी य ।। जे केइ दुट्टदेवा, ते सव्वे उवसमंतु मम ॥४॥ ह्रीं स्वाहा ॥ 'एम भणी अभिषेक करवो ॥१॥ दरेक स्नात्रनी शरुआतमा 'नमोऽर्हत्' बोलवू अने पछी स्नातनी गाथा बोलवी । पछी ॐ नमो जिणाणं इत्यादि पाठ अने चार गाथा भणी अभिषेक करवो ॥१॥ स्नात्र २ - ॐ ओमितिनिश्चितवचसे, नमो नमो भगवतेऽर्हते पूजाम् । शान्तिजिनाय जयवते, यशस्विने स्वामिने दमिनाम् ॥२॥ हा ॥ १. ॐ नमोऽर्हते परमेश्वराय चतुर्मुखाय परमेष्ठिने दिक्कुमारीपरिपूजिताय दिव्यशरीराय त्रैलोक्यमहिताय देवाधिदेवाय अस्मिन् जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे दक्षिणार्धभरते मध्यखण्डे अमुकदेशे-अमुकग्रामे अमुकजिनप्रासादे अमुकगृहे शान्ति-स्नात्रविधिमहोत्सवे स्नात्रस्य कर्तुः कारयितुश्च श्रीसंघस्य ऋद्धिं वृद्धिं कल्याणं कुरु कुरु स्वाहा । आ पाठ कोई कोई पूजा वखते बोलाय छ। विमल केवल भासन भास्कर, जगति जन्ममहोदयकारणम् । जिनवरं बहुमानजलौघतः, शुचिमनाः स्नपयामि विशुद्धये ॥१॥ स्नात्र करतां जगद्गुरु शरीरे, सकलदेवे विमलकळश नीरे । आपणां कर्ममळ दूर कीधा, तेणे ते विबुध ग्रंथे प्रसिद्धा ॥२॥ हर्ष धरी अप्सरा वृंद आवे, स्नात्र करी एम आसीस भावे । जिहां लगी सुरगिरि जंबूदीवो, अमतणां नाथ जीवानुजीयो ॥३॥ ॐ ह्री श्री परमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमते जिनेन्द्राय जलादिकं यजामहे स्वाहा ।। ( आ पाठ दरेक स्नात्र वखते विधिकारक पण बोले), श्री अष्टोत्तरी व शान्तिस्नात्रादि विधि ॥८२ ॥ Join Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600250
Book TitleVividh Pujan Sangraha
Original Sutra AuthorChampaklal C Shah, Viral C Shah
Author
PublisherAnshiben Fatehchandji Surana Parivar
Publication Year2009
Total Pages266
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size21 MB
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