SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 228
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्री अष्टोत्तरी व शान्तिस्नानादि विधि ॥५९॥ (१०) अधोमुख - ॐ नमो नागाय पातालाधिष्ठायकाय पद्मवाहनाय सपरिजनाय-आगळ पाठ पूर्ववत् । बलिक्षेप-चन्दनादि पूजन वगेरे दशे वखत करवं. ते ते दिशामां - ॥ इति दशदिक्पाल आह्वान बृहविधिः १० ॥ ११ अथ अष्टोत्तरशत (बृहत्) स्नात्रविधिः । (१) मुहूर्तने दिवसे प्रभाते अंग अवयवे करी पूर्ण, चक्षु प्रमुख खोड रहित, डाभ प्रमुख लांछन विनाना १०८ स्नात्रिया मेळववा. तेमांथी चार अति निपुण, स्पष्ट वक्ता, अखण्ड (चोटली) श्री अष्टोत्तरी व युक्त एवा वृद्ध श्रावक शुद्ध जळ हाथमां लई नीचेनो मन्त्र बोलो :- ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे । शान्तिस्नानादि अमृतवर्षिणि अमृतं स्त्रावय स्त्रावय स्वाहा ।आ मंत्र वडे सात वार मंत्रीने जळ शुद्ध करो। विधि (२) ॐ ह्रीं यक्षाधिपतये नमः । ए मंत्र वडे सात वार दातण मंत्री दातण करे-मुखशुद्धि करे । ॥ ५९॥ (३) पछी मंत्रित जळे अंजलि भरी ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कामदेवाधिपते ममाभीप्सितं पूरय पूरय स्वाहा । ए मंत्र सात वार भणी मुख प्रक्षालन करे । (४) पछी मंत्रित जळ लई, पूर्व सन्मुख Jain Education International For Personal & Private Use Only www.ininelibrary.org
SR No.600250
Book TitleVividh Pujan Sangraha
Original Sutra AuthorChampaklal C Shah, Viral C Shah
Author
PublisherAnshiben Fatehchandji Surana Parivar
Publication Year2009
Total Pages266
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size21 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy