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________________ विद्यारत्न महानिधी Jain Educatio KKKKKARNI भाषा - यह मंत्र जिसके कंठस्थ है उसके पास व्यंन्तर - विष - विषमज्वर - दुष्टग्रह - शाकिनी - प्रमुख दोष नहि आते, दुरसेही भाग जाते है. सद्योदासतिकर्षित—करालकरवालकर्षितः शत्रुः । श्रीपार्श्वमंत्रमुच्चै रुच्चरतां देहिनां नित्यम् ॥ ३१ ॥ भाषा - श्रीपार्श्वनाथ भगवानके इस मंत्र का उच्चारण जो करता है उसके सन्मुख करालतरवारनिकाल शत्रु खडा होजावे तो वहभी दासके सदृश होजाता है. निन्दुविरूपवंध्या, शल्यवती दुर्भगादि दोषत्वम् । भजते न जातुजिनवर - वरमंत्रपरायणो जन्तुः ॥३२॥ भाषा - ईसमंत्रको पाठ करनेवाली स्त्रीको निन्दु ( बच्चा पैदा होनेकेबाद मरजाना ) खराब शकल, वांझ, शल्यवाली, दुर्भगादि दोष नही सताते है. 1 कीर्ति कमलारमणी, राज्यंसौभाग्यमाशुसौख्यानि । मंत्रेलब्धेप्यस्मिन्निह, जन्तोसपदिजायन्ते ॥ ३३ ॥ भाषा - इस मंत्रके प्राप्त होनेपर मनुष्यको कीर्ति, लक्ष्मी, सुंदर स्त्री, राज्य, सौभाग्य, सौख्य, यह सर्वकी प्राप्ति होती है | तममररमणीनिकरः, सरभसमभिसरतिदिव्यविश्रान्तम् । लावण्यसिन्धुगाहन - गिरिराजे यस्य चेतसो वृत्तिः ॥३४॥ | भाषा - लावण्यसमुद्र अवगाहन करनेभे मेरुपर्वत सदृश मंत्रराज जिसके चित्तमें जमा है उसे देवांगनाभी अभिसरण करती है. देदीप्यमान विश्रांतस्थान होजाती है. For Personal & Private Use Only RAK द्वितीयोऽ धिकारः २ १३. ainelibrary.org
SR No.600214
Book TitleVidyaratna Mahanidhi
Original Sutra AuthorBhadraguptasuri
Author
PublisherMahavir Granthmala
Publication Year1936
Total Pages50
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size5 MB
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