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________________ विद्यारत्न महानिधी Jain Education 班的我抬班進班的班的班的我的班张 भाषा - बुद्धिमान पुरुषने ध्यानपुर्वक ६ मास पर्यंत प्रतिदिन एकहजार जाप करना, पार्श्वनाथ भगवानकी बडी पूजा पढ़ानी चाहिये यह मंत्र देवोसें पुजित है. महासत्वशालिको मंत्रकी सिद्धि होती है. यस्यायंसिध्यते मंत्रो, वश्ये तस्यवसुंधरा । सद्योभवति मंर्तस्य, कर्तव्यो नात्र संशयः ॥ २० ॥ | भाषा - जिस पुरुषको यह मंत्र सिद्ध होता है पृथ्वी उसके वश होती है इसमे संशय नहीं करना चाहिये. द्वारेतस्यगर्जन्ति, शैला तुङ्गशरीरकाः । मुहुः स्रवन्मदासार - सितोर्वीकामंतगजाः ॥ २१ ॥ हेषन्तिच हयद्वारे, वेगनिर्जित वायवः । प्रणतिं याति पादान्तं, तस्यस्फारितभक्तिकम् ॥ २२ ॥ भाषा - जिसने पृथ्विको मदसे सिंचित किया है ऐसे पर्वत सदृश मदोन्मत्त हस्ति उसके द्वारपरगर्जना करते है, उसके दरवाजे में अपनेवेगसे वायुको जितनेवाले घोडे गरजते है, जिनका भक्तिभाव विशेष स्फुरायमान हुया है ऐसे शत्रु मन्त्रवादीके पगमें नमस्कार करतें हैं. पादपीठलुठन्मूर्ध-मुकुटकोटितटोत्कटा । पादयोः तस्य भुपालाः, गुठन्ति बहुमामिनः ॥ २३ ॥ भाषा - मंत्रवादीके पगमें करोडो मानी राजाओंके मुकुट लोटती है, यानि मानिराजाभी नमस्कार करते है. दोषान् कोपि गृहाति, गुणान् सर्वोपि भाषते । तस्य सौभाग्ययुक्तस्य, यस्य तुष्टो जिनेश्वरः ॥ २४ ॥ भाषा - उस सौभाग्यशाळी मंत्रवादीके दोषोंको कोई ग्रहण नही करता परंतु उसके गुणोंका सब कोई कथन करते है, जिसके उपर भगवानकी कृपाहो उसका कहनाही क्या ? For Personal & Private Use Only *** द्वितीयोऽ धिकारः २ ११ inelibrary.org
SR No.600214
Book TitleVidyaratna Mahanidhi
Original Sutra AuthorBhadraguptasuri
Author
PublisherMahavir Granthmala
Publication Year1936
Total Pages50
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size5 MB
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