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________________ विद्यारत्न महानिधी Jain Education AYKKKKRTY कर्मदावहुताशस्य, प्रशान्ति नववारिदम् । गुरूपदेशाद्विज्ञाय, सिद्धचक्रं विचिन्तयेत् ॥ १५ ॥ भाषा — गुरुमहाराजके उपदेशसे जानकर कर्मरूपी दावानलके शांतिकेलिये नवीन मेघकेसमान इससिद्ध चक्रका चिन्तनकरना चाहिये ( इसचक्रको नवपद चक्र नही समझना ) चीर्णेरपि चिरं कालं, तपोभिरमलैः सदा । कथंचित् प्राप्यतेपुंभिः, महामंत्रो महागुणः ॥ १६ ॥ भाषा — चिरकालतकनिर्मल तपस्याकरनेवालेको कथंचित् महागुणवाला यह महामंत्र प्राप्त होता है. मंत्रोद्धार आसिआ उसा नमः " अनाख्येयमसाधूनां साधुनामापियत्नतः । कथ्यमेकान्तदेशे तु, मंत्रस्यास्य स्वरूपकम् ॥ १७ ॥ भाषा - यह मंत्र असाधु पुरुषको नहि कहना, साधु पुरुषको एकांतप्रदेशमें इस मंत्र के स्वरूपको यत्नसे कहना. मूल मंत्रोपि व्याख्येयो, महागुणविवर्धनः । येन विज्ञानमात्रेण, संपदः सर्वतो मुखा ॥ १८ ॥ भाषा - महागुणको विवर्धन करनेवाला मुलमंत्रका कथन करना जिसके विज्ञानमात्रसे सर्वतो मुखी संपदा प्राप्त होती है. मंत्रोद्धार “ ॐ अर्ह असिआउसा नमः " यह नवपदका मूलमंत्र है. त्रिभुवनस्वामिनीविद्या, त्रिभुवनस्वामितास्पदम् । विद्यांस्मरत हे धीराः, यद्यक्षयसुखेच्छवः ॥ १९ ॥ For Personal & Private Use Only 発 प्रथमो धिकारः १ nelibrary.org
SR No.600214
Book TitleVidyaratna Mahanidhi
Original Sutra AuthorBhadraguptasuri
Author
PublisherMahavir Granthmala
Publication Year1936
Total Pages50
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size5 MB
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