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________________ दान सुपात्रें ये चित्त लाय || ज्ञान क्रियायोग राखे निर्मला, पुण्यानुबंधी पुण्य कदेवाय ॥ श्री० ॥ १० ॥ विरमे परनुपताप थकी सदा, पाले आवश्यक षटूकाय । शुक्ललेश्या शुभध्यान हृदय धरे, पुण्यानुबंधी पुण्य कहेवाय ॥ श्री ॥ ११ ॥ श्री जिनधर्म विराधे नहीं कदा, निरवाय निरुवम जय सात ॥ जरतेश्वर राजानी परें लहे, पुण्यानुबंधी पुण्य विख्यात || श्री ||१२|| निरोगादिक गुणयुत महर्धिया कोणी कनी परें पापसंयुक्त || पापानुबंधी पुण्य होये सही, अज्ञान निष्टयकी गुरु उक्त ॥ श्री ॥ १३ ॥ जे पुण्य पापोदयश्री दरिद्री, दुखीया पण पामे जिनधर्म ॥ पुण्यानुंबंधी पाप कहीजीयें, तेथी पामे सुरनर शर्म ॥ श्री० ॥ १४ ॥ अति जारी कर्मा पापी नरा, निर्घृण निर्दय धर्म विहीण | दुखीया पाप करण नजमालीया, पापानुबंधी पाप अखी || श्री ||१५|| धर्म दिधा ते समकीत जालीयें, साधु श्रावकनो कह्यो जगमा || तेहनुं मूल सम्यत्व वखाणीयें, आठ गुणें करी शुद्ध प्रमाण ॥ श्री० ॥ १६ ॥ यावत् समकित श्राये निर्मलुं, धर्मतयुं फल शुभ सुखवृद्धि || अनुकूल वायुथकी कर्षातली, श्राये बहुपरें सम्यक्त्व वृद्धि ॥ श्री० ॥ १७ ॥ नमतां नवचक्रमांदे प्राणीयें पाम्यां जन्म मरणनां दुख || दुखगमा जिनधर्म संजारीयें, जेहथी लही यें अविचल सुख ॥ श्री० ॥ १८ ॥ धर्मकी वांवित संपत्ति मले, धर्मथकी पूगे मन आश ॥ धर्मथकी सज्जन मेलावमो, धर्मश्री लहीयें लील विलास ॥ श्री० ॥ १५ ॥ चिंतामणि सुरतरु सारिखो, कामगवी सुरघट अनुमान ॥ कहे जिनदर्ष अधिक एहथी घलो, आपे शिव सुख देव विमान || श्री ||२०|| सर्वगाथा १४१ ॥ ॥ दोहा ॥ इत्यादिक देसा सुणी, गुरुमुखथकी कुमार ॥ तदा शुद्ध सम्यवत्वसुं, आदरीयां व्रत बार ॥ १ ॥ श्री जि अर्चन पवित्र, श्राद्धधर्म सुरवृक्ष ॥ कमरें आरोपीयो तदा, गुरुवचने प्रत्यक्ष ॥ २॥ नठयागुरुवांदी करी Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600177
Book TitleVissthanakno Ras
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages278
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size7 MB
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