________________
वीश
110011
XXXXXXX
जोगवीने मुक्तातमा ए, निश्चय परमातमा ए ॥ १३ ॥ निजशक्त मन नमहीए, आवश्यक आद रिये सही ए ॥ जिनपद प्राप्ति जेहथी ए, त्रिविध त्रिविध उपयोगश्री ए ॥ १४ ॥ अरुणदेव राजातो ए, सांगली दृष्टांत सुहामलोए सेवीजें अगियारमो ए, थानक जिनहर्ष मुक्ति रमोए ॥ १५ ॥ सर्वगाथा ॥ २२ ॥ इति एकादश स्थानके अरुणदेवनृपकश्रा ॥
॥ दोहा ॥
दश यानकविषे, जे सुविवेकी होय ॥ धरे शील निर्मलपरें, तास न गंजे कोय ॥ १ ॥ जिम नृपमां चक्री अधिक, देवमांहि देवें ॥ तेजवंतमां दिनमणी, ग्रहगणमांहि चं ॥ २ ॥ ऐरावण गजमांहि जिम, श्वापद मांहे सिंह ॥ व्रतमांहे जेम ब्रह्मव्रत, आमी वाली लीह ॥ ३ ॥ चिंतामणि कर तेहने, कल्पद्रुम तसु गेह ॥ कामधेनु घर प्रांगणो, शील समुज्वल तेह ॥ ४ ॥ देवी स्त्री तिर्यचणी, काम तो अनुराग ॥ करंण करांवण अनुमते, मनवच कायात्याग ॥ ५ ॥ खट त्रण साथै जोमतां, थाये नेद प्रढार | अथवा तीन प्रकारनो, कह्यो शील सुखकार ।। ६ ।।
॥ ढाल १ ली ॥ इंडर आंबा आंवली रे ।। ए देशी ॥
सदाचार पहिलो यथारे, बीजो सहस्र प्रहार || नव ब्रह्म गुप्तिसुं तीसरो रे, केवली को विचार ॥ १ ॥ नविकजन सांजलजो अधिकार, ए तो सुणतां जयजयकार ॥ एतो सुणतां दर्ष अपार, एतो वारमुं थानक सार ॥ एतो पालो निरतीचार ॥ ज० ॥ २ ॥ यतः ॥ शुद्ध समाचार मनिंदणिजं, सहस्स अहारस लरकणांच || जानिहाणं च महाचयंति, शीलंति हा केवलिलो वयंति ॥ १ ॥ परिहरवो सदु नारीनो रे, नव ब्रह्मचर्य समाध ॥ सहित मनोवंच कार्यनो रे, मुनिवर अव्याबाध ॥ ज० ॥ ३ ॥ कृंत कांरित अनुमोदना रे, वर्जन जाओ जीव || शील महाव्रत पालवं रे,
Jain Educationa International
For Personal and Private Use Only
स्थान०
आघा
www.jainelibrary.org