SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 124
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ वाडा जेहना जेहवा गुण हुवे, जाणो तास स्वरूप ॥ देव गुरुधर्मने विषे, सम्यक श्रद्धारूप ॥ २ ॥ अरि स्थान हंत देव सुसाधुगुरु, केवलि नाषित धर्म ॥ त्रण तत्व ए सहदे, ते सम्यक्त्व अकर्म ॥ ३॥ ते ॥पना सम्यक्त्व अनेकधा, हुवे परिणाम वशेण॥ऐग ऐति वीहा चनविहा, पंचविह दस विद श्रेणी ॥५॥ धर्मतत्व रुचि एविधि, दुविहे निसर्ग उपदेश ॥ दायक क्षयोपशम केवली, नपसमि कृतिविशेष E॥ ५ ॥ कीजें स्वास्वादन युक्त, थाये चार तिवार ॥ वेदक समकित युक्तसुं, थाए पंच प्रकार ॥६॥ ॥ ढाल पेहेली ॥ देशी चोपाश्नी॥ _दशप्रकार समकित हवे सुणो, निसर्ग रुची नुपदेशरुचि गुणो॥ आझारुचि सूत्ररुचि अवधार, बीअरुचि अन्निगमरुचि विस्तार ॥१॥ किरियाँरुचि कहीए आग्मी, संक्षेप रुचि नवमी नपशम॥ Salधर्मरुचि दशमी नच्चरे, अनुक्रमें लहीये ते कीण परें॥२॥ नवमां नमतां घणां आवर्त, पाद चरम SEI पुद्गल परावर्त ॥ सनी पणंदी पर्यापतो, वधते परिणामें थयो तो॥३॥ मोहनी सीतेर कोमाकोमी नाम गोत्रनी वीश वीश जोमी ॥ त्रीश कोमी कोमी थिति चारनी, आयु सागर तेत्रीश लारनी Sailuu ॥ असंख्य नाग पढ्योपम हीण, सागर कोमाकोमी प्रवीण ।।एक मूकी बीजी खेपवे, सघली Isalहिजिनवर एम यवे ॥ गिरिशिर नपलतणीपरें जीव, यथा प्रवृत्ति करणे सदीव ॥ अणानोग परे Sal आवेश, गंगीतणे देसंमि वसे ॥ ६॥ गंगीनेद अ दुर्नेद, निविझ गूढ गंठी जेम वेद ॥ कर्मजनित बंधन आकरां, जीवतणे पोते ने खरां ॥ ७॥ अन्नव्य आवी हां वार अनंत, च्य श्रुत लहे समsalकित न लहंत ॥ बांधे जेष्ट स्थिति ते वली, नमे रमे चनगति मोकली ॥ ७ ॥ अपूर्व कर्ण मोघरने sal ॥ jधाय, ग्रंथी नेद करे शुन्न नाय ॥ अंतर मुहूर्ते पहोतुं तेह, अनिवृत्तिकरणविषे गुणगेह ॥ NET अंतर करण करी महानाग, करे मिथ्यात्व स्थिति बे नाग ॥ अंतर मुहरत प्रमाणे तेह, हेग्ली Jain Education international For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600177
Book TitleVissthanakno Ras
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages278
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy