SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 115
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ माहिरे, आव्या मुनिचंद सूर ॥ मास खमण उपवासिया, मुज गुरु पण नूर ॥ ४ ॥ एहने तप पारगुं, जश् न शकुं गुरुपास ॥ मुनिपति गुरु नुख्या हो, इणिपेरे रह्यो विमास ॥५॥ ॥ ढाल १२ मी ।। जननी मन आशा घणी ॥ एदेशी॥ वीरन्नद्र मुनि चिंतवे, हवे कहूं किम करिये रे॥ पुण्यपोचे नहि माहरूं, पुण्यविण केम तरियरे ॥ वी॥१॥पूर नदी विचमें वहे, अयो ए अंतरायो रे ॥ ज न शकुं हुं शुं करूं, मनमें एम पठतायो रे Mal वी॥२॥ प्रायें पुण्यवंत नरनणी, तपस्वीने काजे रे॥नोजन सामग्री होवे, सफली ते गजे रे॥ वी० ॥३॥ गुण त्रीशे शोनता, पूरवना अधिकारी रे ॥ दुःकर तप करि अग्रणी, नव कल्प विहारी रे ॥ वी॥४॥ नर नारी प्रतिबूझवे, देशना अमृत धारो रे ॥ एहवा अतिथि पुपये मले एम करे विचारो रे॥ वी० ॥५॥णीपरे नावना नावतां, साधुजिनो घ्यानो रे॥ करतां सुरक्षा प्रत्यक्ष अयो, देश्ने बहु मानो रे॥ वी० ॥६॥ पाए लागू प्रेमसुं, धन धन तुज अवतारो रे ॥ साधु नपर नक्ति ताहरी, साची गुण धारो रे ॥ ७॥ पूर नदीनो में करयो, कीधोति तुज अंतरायो रे ॥ खमजोस्वामी तुमे प्रनु, मोटो तुं मुनिरायो रे॥ वीणाजा पूर नदीनो संहस्यो, आव्यो गुरुपासेरे ॥ सुर पू. श्रीगुरुप्रत्ये, पाय प्रणमी नल्लासे रे ॥ वी॥ ए॥ मुनि नावना एsal नावतो, फल पाम्यो कहे, रे॥ कर्मतीर्थकर निर्मबुं, आगे लहेशे एहबुं रे॥ वी० ॥ १० ॥ दान दया तप जप क्रिया, धरम कारज गमे रे ॥ जेहवी पाये नावना, फल तेहबुं पामे रे॥वी॥११॥ यतः ॥ ज्ञाने ध्याने दाने, मौने देवार्चने तथा तपसि ॥ यदि निर्मलो न नावो, तदा हुतं नस्मनि समग्रम् ॥ अर्थः-ज्ञान, ध्यान, दान, मौनव्रत तथा तप अने देवपूजनने विषे जो निर्मल नाव थाय नहि तो सघj नस्मने विषे होम्या जेवं निष्फल ॥ मंत्रे तीर्थे गुरौ देवे, स्वाध्याये नेषजे A rary.org Jain Educ a tional For Personal and Private Use Only
SR No.600177
Book TitleVissthanakno Ras
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages278
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy