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________________ ACCORRECHAR एमेव इत्थीनिलयस्स मुले, न बंभयारिस्स खमो निवासो ॥८३ ॥ अइंसणमप्पत्थण-मचिंतणमकित्तणं तुरीयं । नारीजणस्स सुहयं, हवेइ वेरग्गधारीणं ॥ ८४॥ विभूसियाहिं देवीहिं, विरत्तो खोहिउं न सको यातहवि हु एगंत हिय-म्मि य नाउं विवित्तं मा सहय ॥८५॥ रूवेसु जो गिद्धिमुवेइ तिवं, अकालियं पावइ सो विणासं। रागाउरो सो जहवा पयंगो, आलोयलोलो समुवेइ मधु ॥ ८६ ।। सद्देसु जो गिद्धिमुवेइ तिवं, अकालियं पावइ सो विणासं । रागाउरो सो हरिणुव गिद्धो, सद्दे अतित्तो समुवेइ मचुं ॥ ८७ ।। एवमेव स्त्रीनिलयस्य मूले, न ब्रह्मचारिणः क्षमो [ योग्यो] निवासः॥ ८३॥ अदर्शनमप्रार्थन-मचिन्तन-मकीर्तनं चतुर्य (चतुर्थ)। नारीजनस्य सुखदं (शुभदं), भवति वैराग्यधारिणाम् ॥८४॥ विभूषिताभिर्देवीभि-विरक्तः क्षोभितुं न शक्यश्च । तथापि खलु एकान्त हिते च ज्ञात्वा विविक्तं मा सह(श्रय)त ॥ ८५॥ रूपेषु यो गृद्धिमुपैति तीब्रां, अकालिकं प्राप्नोति स विनाशम् । रागातुरः स यथा वा पतङ्ग, आलोकलोलः समुपैति मृत्युम् ॥ ८६ ॥ शब्देषु यो गृद्धिमुपैति तीव्रां, अकालिकं प्राप्नोति स विनाशम् । रागातुरः स हरिण इव गृद्धः, शब्देऽतृप्तः समुपैति मृत्युम् ॥८॥ *AIGAARASSASSA Jain Education For Private &Personal use Only 8 rainelibrary.org
SR No.600132
Book TitleVairagya Shatakadi Granth Panchakam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKesharmuni
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1941
Total Pages172
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size8 MB
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