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________________ श्रीगुणचंद महावीरच ० ५ प्रस्तावः ॥ १७३ ॥ Jain Education eat for तियरोवसग्गवग्गेऽवि ते ण झाणाओ । मंदरगिरिव विचलंति मोक्खसोक्खं च साहंति ॥ २१ ॥ इय भो देवाणुपिया ! अविरयविरयाण दोसगुणसहियं । कहियं तुम्हाण मए सुद्धं सद्धम्मसङ्घस्सं ॥ २२ ॥ चिंतामणिव दुलहं संसारम होयहिंमि भमिराणं | जीवाण नूणमेयं सकम्मगुरुभारपिहियाणं ॥ २३ ॥ एयंमि उ संपत्ते तं न जए जं न पावियं होइ । ता एयंमि पयत्तो कायचो कुसल बुद्धीहिं ॥ २४ ॥ एयं च निरइयारं न साहुदिक्खं विणा घडइ जम्हा । पडिवजह पञ्चजं तम्हा दुहसेलवज्जसमं ॥ २५ ॥ एवं च गुरुणा उबट्ठे सद्धम्ममग्गे पडिबुद्धा बहवे पाणिणो पलीणा मिच्छत्तवासणा जाओ केसिंचि सङ्घविरहपरिणामो अन्नेसिं समुप्पन्ना देसविरइबुद्धित्ति, एत्थंतरे संसारासारयं परिभावेंतो तक्कालतिघवेरग्गसमुग्गयपवज्जापरिणामो गोभद्दो गुरुसमीवं गंतूणं विन्नविउमारद्धो-भयवं ! अमयं व परिणयं मम तुम्ह वयणं समुल्लसिओ विवेओ तुट्टा गेहवासणा, ता तुम्भेहिं निजामगेहिं पबजाजाणवत्तमारुहिऊण भवोदहिं लंघिउमिच्छामि, गुरुणा भणियंभद्द! जुत्तमेयं तुम्हारिसाणं, तओ सूरिं पणमिऊण गओ गेहे, रयणविक्कओवलद्धदत्रेण दिन्नं दीणाणाहाईणं महादाणं, अह पसत्थे तिहिमुहुत्ते सूरिसमीवे गहिया पञ्चज्जा, जाओ महातवस्सी, पालेइ निरयारं समणधम्मं अहियासेइ सम्मं परीसहे पउंजर बालगिलाणाईणं विणयं भावेइ भावणाजालं पढेइ समयसत्थं परिचिंतेइ त भावत्थं - कुणइ अपुच्चापुञ्चतवचरणं, एवं च विसुज्झमाणस्स तस्स वोलिंति वासरा, अन्नया य गुरुमापुच्छित्ता समारद्धाई तेण For Private & Personal Use Only धर्मघोषदेशना गोभद्र दीक्षा च ॥ १७३ nelibrary.org
SR No.600114
Book TitleMahavir Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGunchandra
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1929
Total Pages704
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
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