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________________ श्रीनव०वृह वृत्तौ अतिथि - भागे. ॥ २९२ ॥ Jain Education Intern जइ तुह इच्छा ता निययउवरस्यरसेव मज्झ गया ॥ ३८ ॥ आयावसु जहसचीऍ तीए सम्मं न सद्दहियमेयं । कुणइ य जहाभिरुइयं सा तीऍ निवारियावि दढं ॥ ३९ ॥ अह अन्नया कयाई सुभूमिभागंमि केऽवि पंच जणा । दिट्ठा गणियाऍ समं ललमाणा देवदत्ताए ॥ ४० ॥ अवि य - एगो धरेइ छत्तं एगो विरएइ चामरुक्खेवं । एगो य पुप्फपूरं सिरंमि तीसे कुणइ रुइरं ॥ ४१ ॥ एगो धोयइ पाए उच्छंगगयं धरेइ एगो तं । देविव्व दिव्वलीलाय सा ठिया तीऍ सच्चविया ॥ ४२ ॥ तं दहं सा चिंतइ धन्ना एसा पुरा विहियसुकया । सेविज्जइ जा एवं बहुचाडुरएहिं पुरिसेहिं ॥ ४३ ॥ मझं इमरस सुचरियतवस्स जइ अस्थि किंपि फलमहुणा । ता एवमण्णजम्मे होहं पंचण्ह दइयाऽहं ॥ ४४ ॥ एवं विहियनियाणा कम्मोदयओ सरीरबाउसिया । चिट्ठित्तु कंपि कालं मया गया बीय| कप्पंमि ॥४५॥ देवी नवपलियाऊ होउं तत्तो चुया ठिइखएणं । पंचालजणवएसुं कंपिल्लुपुरंमि नयरंमि ॥ ४६ ॥ दुवयनरिंदस्स सुया चुलणीदइयाएँ गन्भसंभूया । जाया विसिद्धरूवाइसंपया दोवई नामं ॥४७॥ तीसे सयंत्ररामंडवो य कारा| विओ विभूईए । मिलिया अणेगकोडी तत्थ नरिंदाण विविहाणं ॥ ४८ ॥ सा पंडवाण मंचं संपत्ताण अह सयंवरे तंमि । पत्थरस | गले खिविउं उक्खित्ता तीऍ वरमाला ॥ ४९ ॥ पडुपवणवसेणेसा पडिया पंचण्ह पंडुपुत्ताणं । उवरिं च समुग्घुडं, सुरेहि For Private & Personal Use Only दोषे नागश्रीकथा. ।। २९२ www.jainelibrary.org
SR No.600105
Book TitleNavpad Prakaranam
Original Sutra AuthorYashovijay Upadhyay
Author
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1927
Total Pages710
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size14 MB
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