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________________ सच्चस्स अक्खाणयं सिरिसंति- परिहित्तु धोयपोत्तिं पूयं अटुप्पयारमवि घेत्तुं । बच्चइ जिणिंदभवणे दटुं दारम्मि जिणबिंब ॥४०॥५७२९॥ नाहचरिए 'जय जय जयहि' भणित्ता निसीहियापुव्वयं तओ विसइ । दाउं पयाहिणतिग निसीहियं पुण वि काऊण ॥४१॥५७३०॥ पविसइ मंडवदारे तइयं पि निसीहियं पुणो काउं । गब्भहरम्मि पविटो णिम्मल्लइ भगवओ बिंब ॥४२॥५७३१॥ पूयं अटुपयारं भत्तिब्भरनिभरो विहेऊण । भूमिं तिहा पमन्जिय पणामतियपुव्वयं चेव ॥४३॥५७३२॥ दइ जिणिंदबिंबे मुद्दातियगम्मि सुटु उवउत्तो । तिदिसिनिरिक्खणविरओ, तिण्णि अवत्थाओ भावेतो ॥४४॥५७३३॥ अंते पणिहाणतिग, काऊणं जाइ गुरुसमीवम्मि । बारसवत्तं दाउं वंदणयं दोसपम्मुक्कं ॥४५॥५९३४॥ *पुव्वगहियं पि गिण्हइ पञ्चक्खाणं पुणो वि गुरुपुरओ । सुणइ तओ वक्खाणं अपुव्वरसभावणाकलिओ ॥४६॥५७३५॥ जइपुच्छं काऊणं वच्चइ हट्टम्मि कुणइ ववहारं । अविरुद्धं तो गच्छइ णियगेहे भोयणटाए ॥४७॥५७३६॥ पडिलाहिऊण मुणिणो पच्छा भुंजित्तु कुणइ संवरणं । वंदित्तु तओ देवे, वच्चइ वसहीए गुरुमूले ॥४८॥५७३७॥ सोउं पुण वक्खाणं, गुरूण तो बंदणं पुणो देइ । काउं पडिकमणाई सज्झायं कुणइ उवउत्तो ॥४९॥५७३८॥ जहसत्तीए साहूण कुणइ विस्सामणं महासत्तो । एइ पुणो गेहम्मि सरीरचिंतं तओ कुणइ ॥५०॥५७३९॥ सुमरित्तु नमोक्कारं विहिणा वीसमइ णिययसेज्जाए । सुमरइ देव-गुरूणं पाए परमाए भत्तीए ॥५१॥५७४०॥ १. गम्मि सुहउ उब जे०।।
SR No.600084
Book TitleSiri Santinaha Chariyam
Original Sutra AuthorDevchandasuri
AuthorDharmadhurandharsuri
PublisherB L Institute of Indology
Publication Year1996
Total Pages1016
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size17 MB
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