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________________ सिरिसंतिनाहचरिए अइणिद्धं अइमहुरं अइलवणमईव अंबिलं कंडुयं । अइतित्तमइकसायं वज्जइ जं चित्तरुइयं पि ॥२४॥४६२४॥ तम्मिय नयरे तम्मिय समए महाअसिवमुप्पन्नमासि, अवि य मरइ पभूओ लोगो, बट्टइ जणसंखओ अइमहंतो । तत्तो उ उबसमट्ठा करइ उवाए बहू लोगो ||२५||४६२५|| न यतं तिलमेत्तं पि हु उवसमइ कहिं पि कहवि हु नराण । जायइ अइरुद्दं चिय एवं आदण्णओ लोगो ॥ २६ ॥ ४६२६ ॥ भयवंतम्मि य तइया संजाए अइरउयरसरहंसे । सहस त्ति सव्वदेसे गंधेण व गंधहत्थिस्स ॥ २७|४६२७ ॥ इयरगया इव रोगा झडत्ति अहंसणं गया सव्वे । तो जणणि-जणयमाई हियए एवं विचिंतेंति ॥ २८ ॥४६२८ ॥ "नूणं एस पभावो होही एयस्स अम्ह गन्भस्स । गन्भदिणादारंभिय जम्हा मारी गया नासं ॥ २९ ॥ ४६२९ ॥ ! नज्जइ य इमं एवं जम्हा पढमम्मि चेव दिवसम्मि । अइसंभमरहसवसा समागया सयलतियसिंदा ||३०||४६३०|| जणणीए समं एसो पणओ सव्वेहिं तह य भत्तीए । 'जय रयणकुच्छिधरिए नमो नमो तुह' इमं भणिउं ||३१||४६३१॥ ताजइया गब्भाओ विणिग्गओ होहिही इमो गब्भो । संति त्ति नाममणहं तइया एयस्स काहामो” ॥ ३२ ॥ ४६३२ ॥ एवं च दिणे दिणे पवडूढमाणो गन्भो संजाओ नवमासिओ अद्धमदिवसिओ य । एत्थंतरम् य मेस - विस-मयर-कन्ना कक्कि मीण- तुलाइएसु उच्चरासीसु दस-तिग-ऽद्वारस-पन्नरस- पण सत्तावीसबीसइडाणाइएसु य परमुच्चेसु पाएणं संडिया सव्वे वि सूर-ससहर-धरासुय-बुह-सुरगुरु- सुक्क-सणिच्छराइया खेर ति । १. कुडुयं । वज्र तयं तयं चिय बाइ जे० ॥ २. अद्दन्नओ त्रु० ॥। ३. पहावो पा० विना ।। ४. सब्बेहि एस भ° पा० ॥ ५. त्ति नास्ति पा० त्रु० ॥ बारसमं भवग्गहणं ५३७
SR No.600084
Book TitleSiri Santinaha Chariyam
Original Sutra AuthorDevchandasuri
AuthorDharmadhurandharsuri
PublisherB L Institute of Indology
Publication Year1996
Total Pages1016
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size17 MB
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