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मुखबन्ध!
श्रावकधर्मবস্থায় चूर्णिः ।
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काउं पढममेव भुंजंति, ततो तेऽवि एगागिणो" ग्रन्थकार श्रीमद्धरिभद्रसूरीश्वरे अंतिम लोकना अंतिम चरणोमां “ देशविरति " धर्मनुं ( श्रावकधर्मर्नु ) परिपालन करता " सर्वविरति अथवा चारित्रधर्मनु' परिणाम केवी रीते आत्मामा जन्मे या ऊपजे ते अतिस्पष्ट शब्दोथी वर्णवी ग्रन्थने संकेली लीधो छे. ते आ प्रमाणेः-" भवविरहबीय भूयो जायइ चारित्तपरिणामो ॥ ५० ॥" साथोसाथ प्रन्थकारे पोतानुं स्पष्ट नामनिर्देश न करतां " भवविरह " शब्द सूचवी, भविजीवोने चेतव्या पण छे के अजर-अमर-अभयपद माटे 'संवेगरसायण जेवो' बीजो कोई मार्ग ज नथी.
शेठ देवचन्द लालभाई जैन पुस्तकोद्धार फंडमांथी आ " देशविरतिधर्म अथवा श्रावकधर्मना" परिशीलनने प्रतिपादन करतो आद्य( श्रावकधर्म )पञ्चाशकचूर्णि नामनो ग्रन्थ " अंक १०२" तरीके प्रसिद्ध करतां परम आहाद अनुभवीये छीए.
"जिणवयणमेव सुणतो सावगो होई" जिनेश्वरदेवोना वचनोने सांभळे, विचारे अने परलोकना हितसंबंधे आदरे ए श्रावक बने, थाय, कहेवाय. श्रावकधर्मना लक्षणोमां पण असढभाव, सढभाव, सम्यक्त्व, असम्यक्त्व आदि विविध प्रकारना भेदो स्याद्वाददृष्टिए प्रन्थकारोए वर्णवेलां छे. तथा संसारना निस्तार माटे; श्रावकधर्म अने साधुधर्म उपर पूर्वाचार्योए भविजनोना हित माटे अनेक ग्रन्थो योज्या छे.
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