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________________ व्यवहाररता वैश्या (वन) १९१.१३ व्यष्टम्पयेतामन्यो (होण) १४२.२८ बसबदिशिखांस्तुणं दोण व्याक्षेपणं क्रोधकतं (विरा) ४५.८ व्याघ्राविव सुसंरन्धौ (द्रोण) १३२.११ व्यवहारः प्रजागोप्ता(शांति) १२१.५५ व्यष्टि बाह्मणपूजायां (अनु) १५६.७ व्यासजन्ट शरवातान (कर्ण) २७.५ व्याख्यातः पुरुषो (वन) २१३.१२२ व्याघ्राविव सुसंरब्धा(भीष्म) ४८.४२ व्यवहारश्च नगरे (शांति) ११५.२२ व्यसनं भवतश्चेदं (वन) २८२.५२ व्यसृजन्त शरौघांस्ते (द्रोण) १००.६ व्याख्या। पूर्वकल्पेन (आश्व) ५०.९ व्याघ्रास्यमुग्रकोण (द्राण) १९६.२९ व्यवहारः सुसूक्मश्च (शांति) ५६.५३ व्यसनं भेदनं चैव (वाक्षम) ७.४ व्यसृजश्च सुगन्धीनि (कर्ण) ८७.८७ व्याख्याता मे त्वया (वन) ३१३.११९ व्याजेन चरते धर्ममथं (वन) २१०.६ व्यवहारस्तु वेदात्मा(शांति) १२१.५१ व्यस्ते काले पुनश्चति (वन) ३०५.६ व्याख्याता राजधर्मण (शांति) ७८.१ व्याजेन चरते धर्ममध (शांति) २७३.७ व्यवहारं गदायुद्ध (शल्प) ६४.४३ व्यसनं वा महाघोर (सोप्तिक) ३.१२ व्यस्मयन्त ततो योधा (विरा) ५८.२५ व्याख्यातो ह्यानु (अनु) १०७.१४१ ब्याजेनैव ततो राजन् (स्वर्ग) ३.१६ व्यवहारेण शुद्धन (शांति) ८५.२ व्यसनं वास्य कालोत (वन) ३२.५६ व्यस्मयन्त रणे योधा (द्रोण) १६१.४१ व्यायाधर्मोत्तरे शुक्ले (शांति) ४०.१३ व्याधम चरिष्यन्ति (वन) १६०.१४ उपवहारेष धर्मेष (जाति) २४.१५ व्यसनानि च सर्वाणि (शांति) ५६.४२ व्यहनत्तावकं सैन्यं (कर्ण) ५६.१४३ व्याप्रवत्ताच राजेन्द्र (उद्योग)१७१.१६ व्यात्ताननस्यापततो काले (कर्ण)७६.६ व्यवहारोऽत्र कात्स्येन (आ) २.३३३ व्यसनान्नित्य भीतो (गांति) ८०.२० व्यहन्त्सायकै राजन्सु (कर्ण) २४४३ व्याघ्रपाद इति ख्यातो(मनु)१४.११२ व्यात्तानना घोर (द्रोण) १५६.१३६ व्यवहार्यश्च राजेन्द्र (विरा) ४१४ व्यसने क्लिपमान (उद्योग) १२.१० व्याकुल मे मनातात (कर्ण) ७.२७ व्याघचोटजमूल (शांति) ११७.१ व्यात्तास्यः सस्तकाय(उद्योग) १०५.२५ व्यवमत ततः शक्रस्त (शांति)२७३.५६ व्यसने वर्तमानस्य (द्रोण) १८३.४ व्याकुलाश्च दिश: सर्वा(बिरा)४६.१८ पासिंहमगाणां च (अन) १४.१w व्यादितास्यैर्महानादैः (सभा) २४.२४ व्यशीयंत ततो राष्ट्र (आ) १४.३६ व्यसनरामतप्तस्य नरस्य(मनु)२६.५७ व्याकुलीकृतमत्यर्थ (कर्ण) ४६.६७ व्याधसिजगजा कीन होण)१०१.२० व्याद्रिदेश तथा सन्य(द्राण) १६४ ३२ व्यसवस्तेऽपतन्नम्नो (आ) २२८.३० व्याकुलीकृतमत्यर्थ (कर्ण) ७६.३० व्याघ्रसिंहङ्क्षवदना (शल्य) ४४.२५ व्याविद व्यशीर्यत सपाञ्चाला (द्रोण) ७.४६ व्यसिचमषुपूर्णाङ्गः (द्रोण) ४८.३६ व्याकली कस्य तं द्रोणो द्रोण १२५.२० व्यानं त्वं मन्यसेऽश्मान(कर्ण) ३६.३० व्यादिशतुच किं (आश्व) ८०.२८ व्यश्रयन्त महाराज (कर्ण) २६.१० व्यसितं वीक्ष्य निस्त्रिशं(भीष्म)६६.४२ व्याकूले समपद्यतां (शल्य) १०.६८ व्याघ्र दृष्टवा क्षुधा(शांति)११६.२० व्यादिष्टा देवतैः शूराः(शल्य)४५.११५ व्यश्वनागरथान् (दाण) ११४.३५ व्यसृजत्त महाज्वालं (होण) ११६.२६ व्याक्रोशन क्षत्रिया: (सौप्तिक) ८.३० व्याघ्र शयानं प्रति मा (वन) १३४.३ व्यादापयस्तजसाच (बनु६५.७५ व्यश्वसूतध्वजरयान (कर्ण) २०.६ व्यसृजत्तोमरान मूनि (द्रोण) २६.१३ व्याक्रोशन्बान्धवानन्ये (शल्य) १.३५ व्याघ्रा इव जिघासन्त (द्रोण) १२०.८ व्याधया न भवन्त्यत्र (शाति) ५६.८ व्यश्वसूतरथ चक्र (भीष्म) १०४.२६ व्यसृजत्सायकान् (कर्ण) २५.२४ म्याक्रोशान्त नरा राजन भीष्म) ४६.३६ व्याघ्रान्नागो मदपट (शांति) ११७.२१ व्याधयो विनिवार्यन्ते (वन) २०६.१५ व्यश्वसूतरथं चैन (द्रोण) २००.४३ व्यसृजत् सायकान् (द्रोण) १०६.२२ व्याक्षिपन्सहसा तत्र (कर्ण) २८.३५ व्याघ्राविव व संग्रामे (कणे) १५.१४ व्याधिना चाभिपन्नस्याशातिर व्यश्वसूतरयांश्च (द्रोण) १२२.४८ व्यनजत् सायकान् (वन) २८८.२४ व्याक्षिान मुमहच्चा (द्रोण) १२६.११ व्याघ्राविव नरव्याघ्री(दोष)१३६.३० व्याधिप्रशमनं श्रेष्ठ (अनु) १५०.३१ For P 5 Pesong use Dely
SR No.600055
Book TitleMahabharatam
Original Sutra AuthorNagsharan Sinh
Author
PublisherNag Prakashan Delhi
Publication Year1992
Total Pages840
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size30 MB
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