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श्रीमन्महाभारतम् : : श्लोकानुक्रमणी
४१३ पश्यामि च दिश: (वन) ८०.२२ पश्येयाश्च ततो योधान (आश्रम) ५.३३ पांसुभिः सममिच्छन्न: (शांति) १.१३ पाञ्चाल निहताः (सौप्तिक) ८.१५८ पाञ्चालेषु भविष्यामि(सौप्ति) ३.३० पश्यामि च महाराज(वन) १८८.११४ पश्येयुरद्य मे वीर्य (विरा) ३६.६ पांसुवर्षेण महता (वन) ६.६२ पाञ्चामपुत्रस्त्वरितस्तु(शल्य) २०.२३ पाञ्चाल्यपि तु पञ्च (आ) २२१.७८ पश्यामि च महिपाल (वन)१८८.११३ पश्येरन्न कमतयो न(शांति) ३०६.४८ पांसूपलिप्तसागो (सभा) ८०.६ पाञ्चालराजस्य (उद्योग) १.४ पाञ्चन्स्यप्रग्रहो द्रोणं (द्रोण) ६.२५ पश्यामि च महीं (वन) १८८.१०१ पश्यकपद्यो दृश्यन्ते (विरा) ५.६ पांकशासनिनाऽभीक्ष्णं (द्रोण) १०.४ पाञ्चालराजस्य (द्रोण) १९८.६० पाञ्चाल्यमय सन्त्य (भीष्म) ५३.३६ पश्यामि त्वां (शांति) २२४.३७ पश्यैतान देवकीमात (द्रोण) १८.५ पाकशासनिरायत्तः (द्रोण) १३६.१२५ पाञ्चालराजस्य सुतं (शम्य) २०.१६ पाञ्चाल्यं तु महाबाहो (उद्योग) १७२.१६ पश्यामि देवास्तव (भीष्म) ३५.१४ पश्यता पाण्डपुषाणा (भीष्म) २५.३ पाक्तेयास्त प्रवक्ष्यामि (अन) १०.२६ पाञ्चालराशो विमल (स्त्री) २५.१५ पाञ्चाल्यं त्वरया (द्रोण) १७०.१७ पश्यामि देवास्तव (भीष्म) ३५.१५ पश्यैताः पुण्डरीकाक्ष (स्त्री) १६.१८ पाञ्चजन्यं च बलवान(द्रोण) १०३.४० पाञ्चालस्य च वायादो (वन) १२.२ पाञ्चाल्यं पञ्चविंशत्या (कर्ण)५६.२१ पश्यामि द्रवतों सेना (कर्ण) ७४.५ पश्यैतां द्रवती सेना (द्रोण) १५६४३
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो (भीष्म) २५.१५ पाञ्चालस्य रथस्येषा (मा) १३८.५७ पाञ्चाल्यं विरथं (द्रोण) १९२.२६ पश्यामि बहुलान राजन (वन)३१२.५ पश्यैतान्पार्थिवान, (द्रोण) १७७.१० .
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो(भीष्म) ५१.२५ पाञ्चालस्य सुता (उद्योग) ५०.३५ पाञ्चास्यं शयने (सौप्तिक) ८.१३ पश्यामि लोकानमलान् (अनु) ८.१६ पश्यन कप जुन दुबल वन) ६.१० पाञ्चजन्यरबो घोर:(द्रोण) १२७.२० पाञ्चालानां वधं (द्रोण) १९५.१७ पाञ्चाल्यः सात्यकिश्च (शल्य) १६.३७ पश्याम्येकं मासमिति (आ) १३३.५ पश्यनं तं दुमाग्रस्थं (आ) १३२.७४ पाजन्यस्य निर्घोष (उद्योग)१५१.७० पाञ्चालान् येन (विरा) ५०.२१ पाञ्चाल्याभिसंक्रुद्ध (द्रोण) १९८.४६ पश्यार्जुन महाव्यूहं (कर्ण) ४६.३० पष्टिं गा सहस्राणि (विरा) ३५.१० पाञ्चजन्यस्य निर्घोष (कर्ण) ९४.६० पाञ्चालाः सज्जया (द्रोण) १५६.५१ पाञ्चाल्यायाभिसंकुद्ध(द्रोण) १९८.४६ पश्ये मानस्तदाऽत्मान(शांति) १५६.१५ पस्पगुंश्च करेगा (स्त्री) ८.४ पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं (भीष्म) १.२८ पाञ्चालान्सचयां (सौप्तिक)८.१४६ पाञ्चाल्याश्च महेष्वा(भीष्म) ५१.२८ पश्येदमुत्रं नरवाजिनार्ग (कर्ण) ९४.२ पहन्तो यथाशक्ति (शल्य) २३.८२ पाञ्चजन्यस्य निर्घोष (भीष्म) ७१.२ पाञ्चालाः पाण्डवैः (भीम) ६४.७२ पाञ्चायो राजपुत्रश्च (आ) १३१.४२ पश्ये दोषं ध्र वं युद्ध(उद्योग) १४४.१३ पलवान्बर्बरांश्चैव (सभा) ३२.१७ पांचजन्याभिषिक्तश्च (शांति) ४०.१७ पाञ्चालिकार्थ चित्राणि (विरा)३७.२६ पाञ्चाल्यो सात्यकि (द्रोण) १४७.२६ पश्येदुपायान्विविधः (शांति) १२०५४ पां शुग्रस्ते तत: कूपे (शल्य) ३६.३३ पांचरात्रविदो मुख्या (शांति)३३५.२५ पाञ्चाली प्रार्थवानस्य (आ) २.२०८ पाटयमानेषु कुंभेषु (भीष्म) ४६.२५ पश्येमान्पार्थनिमुक्ता (विरा) ६४.३८ पांशु राष्ट्रावसुदानो (सभा) ५२.२७ पांचरात्रविदो ये तु (शांति)३४६.७२ पाञ्चाली भवतामेका (आ)२०८.१८ पाटलारिकेलैश्च (आ) ६३.४ पश्येषां नमसस्तुल्यां (कर्ण) १६.५२ पासबोपि कुरुक्षेत्र (वन) ५२.३ पांचरात्रस्य कृत्स्नस्य (शांति)३४६.६८ पाञ्चालीं प्राहुरक्लिष्टां(वन) ५१.३६ पाणिकर्णाः सहस्राक्षा(सौप्तिक) ७.२१ पश्येमां सह वीरेण (सौप्तिक) ६.१३ पासबोऽपि कुरुक्षेत्रा (शल्प) ५३.२२ पाञ्चालनबरे चापि (बा) २.११३ पाञ्चालेन क्रमः (शांतिक)३४२.१०३ पाणिकूर्चाश्च शम्बूकः (शल्य) ४५.७६ पश्येयं च सतां लोका (अनु) ५६.४. 'पांसुभस्मकरीषाणां (शांति) १६५.१७ पाञ्चालनगरे तस्मान्नि(आ)१६६.१५ पाञ्चालेषु च कोरव्य(वन) ८७.१५ पाणिग्रहणमन्त्राणां (अनु) ४.५५
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