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________________ क्य. वली जैनशासनमा साधुनने आधार्मिक औदेशिकादि जोगववाने न कल्पे. एटले जैनना जे साधु होय ते पोताने वास्ते करेलु ए आदिक बेतालीश दोष सहित वस्तु ग्रहण करे नही. अने हे पुत्र! तुं तो सदाय काल सुखमां नत्प न अएलो . को दहामो पण फुःखमा रह्योज नथी. एज कारण माटे तुं शीत कहेतां ताढ अने उष्ण कहेतां घांम, कुत् कहेतां कुधा, पिपासा कहेतां तृषा, दं श कहेतां मांस, मशक कहेतां मगतरां, अने नाना प्रकारना रोगादि रूप, परि पह, नपसर्गो प्रत्ये सहन करवाने समर्थ नथी. ते कारण माटे हमणां तने दीदा लेवाने अर्थे आज्ञा प्रापवाने अमे श्चतां नश्री. अर्थात् हमणां तने आज्ञा नही आपीए.” त्यार पनी कुमार कहेतो हवो. "हे अंब! हे तात! तमे जे संजमनी | करता देखामी, ते पुष्करता खलु कहेतां निश्चे क्लिब पुरुषोने अने कातर पुरु षोने एटले कायर पुरुषोने अने कुत्सित पुरुषोने अने आलोकने विषे प्रतिबंधवा या पुरुषोने एटले आ लोकमांज सुख मानी बेठेला तेवानने, अने परलोकथी * अवला मुखवाला श्रएला एवा लोकोने एदले परलोकना सुखना अजाण लोको RXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX* Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600048
Book TitleVairagyashatakama
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamchandra D Shastri
PublisherRamchandra D Shastri
Publication Year
Total Pages270
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size14 MB
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