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________________ अर्थ-हे आत्मन (तासि के०) ते (रुप्रमाणीणं के०) रमती एवियो ने (अ. माले०) अपर अपर जन्मने विषे श्रयेलीयो एवी (माकणं के०) मातान(मक्षिके०) शोकथी निकलतां एवां (नयणोदयंपि के०) नेत्रनां आंसु पण (सागरलखिलान के०) समुन्ना पाणी अकी (बहुयरं हो के०) अतिशे अधिक * होय छे. अर्थात् समुना पाणीवमे पण आंसुना जलनुं परिमाण थइ शकतुं नयी.॥6॥ लावार्थ-केटलाएक पुरुषो स्त्रीयादिक पदार्थथी वैराग्य पामीने दीका सेवा ने तैयार थया होय, परंतु तेन फक्त माता पितानो घणो नेह देखीने अने तेम ने रोतां कलकलतां देखीने, तेना प्रणाम पाग हठी जता जोड्ने ज्ञानी महा. राज तेने उपदेश देवाने अर्थे कहे . के, हे नव्य जीव ! तुं एक नवना माता पिताने रोतां कलकलतां जोक्ने दिलगीर केम थाय ? परंतु विचार कर के, तें कर्मना वशे करीने अनंता नवमां अनंता माता पिताने, रोतां कलकलतां मूकीने तुंआ नवमां आव्यो . ते माता पिताननी आंखमाथी निकलतां प्रां ハ※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※ Jain Education Intern al For Private & Personal Use Only Anyw.jainelibrary.org
SR No.600048
Book TitleVairagyashatakama
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamchandra D Shastri
PublisherRamchandra D Shastri
Publication Year
Total Pages270
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size14 MB
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