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________________ पाठ MADHURRASSORREFRESH ओं ही विमलप्रभदेवायाम्। भास्वद्गुणग्रामविभासनेन पौरस्त्यसंप्राप्तविभावितानं । संस्मृत्य काम बहुलप्रभं तं समर्चये तद्गुणलुब्धिलुब्धः ॥ ५३४॥ देदीप्यमान गुणका प्रकाश करि अग्र प्राप्त भई प्रभाकी संतान जाकै ऐसा बहुलपम नाम जिनेंद्रने अतिशय करि ताका गुणकी प्राप्तिमें लुब्ध हवो मैं पूज हूँ॥५३४॥ ___ओं ही बहुलप्रभदेवायाघम् । नीराभ्ररत्नानि सुनिर्मलानि प्रवाद एषोऽनृतवादिनां वै। येन द्विधा कर्ममलो निरस्तः स निर्मलः पातु सदर्चितो माम् ॥५३५॥ जल आकाश रत्न ये निर्मल हैं, यो झूठो असय बोलने वारेनको प्रवाद है। अरू जाने दोय प्रकार कर्मपत्त दर किया सो निषेत्र है। सो || निर्मल जिन पूजन प्राप्त हुवो थको मेरी रक्षा करो॥५३५॥ ____ओं ही निमलजिनायाघम् । मनोवचःकायनियंत्रगेन चिताऽस्ति गुतिर्यदवाप्तिपूर्तेः । तं चित्रगुप्ताद्वयमर्चयामि गुप्तिप्रशंसातिरिय मम स्यात् ॥ ५३६ ॥ मन वचन काय इनका वश करिवा करि जाके गुप्ति पूर्ण होवात चित्रगुप्ति नाम पाया ताहि मैं पूजू हूँ। यातें गुतिको प्रशंसा प्राप्ति मेरे भी होउ॥५६॥ ओं ही चित्रगुप्तिजिनायाघम् । अपारसंसारगतौ समाधिलब्धो न यस्माद् विहितः स येन । समाधिगुप्तिर्जिनमर्चयित्वा लभे समाधिं त्विति पूजयामि ॥ ५३७ ॥ RECEPट For Private & Personal Use Only Jain Education by Malelibrary.org
SR No.600041
Book TitlePratishthapath Satik
Original Sutra AuthorJaysenacharya
Author
PublisherHirachand Nemchand Doshi Solapur
Publication Year
Total Pages316
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size17 MB
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