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बेराग्यशतकम्
॥८९॥
यावने च नदीवेगसंनिभं पापजीव किं इदं न बुध्यसे जुवणे ये नइवगसंनिभे । पावजीव कि मिय ने घुझसे ॥ ४५ ॥
भाषांतर ME अर्थ-(संझराग के०) संध्या समयनो रंग, तथा (जलबुब्बु के०) पाणीनो परपोटो. (ओवमे के०) ए बेनी छे ||
सहित all उपमा ते जेने एवं, (य के०) अने ( जलबिंदु चंचल के० ) डाभना अप्रभाग उपर रहेला पाणीना बिंदु जेवू चंचल | ॥८९॥ ५एवं, (जीवोए के०) जीवित सते (य के०) वली [नइवगसंनिभे के०] नदीना वेगने तुल्य ए (जुम्वणे के०) यौवन |
सते (पावजीव के०) हे पापजीव ! (न बुज्से के०) तुं नथी बोध पामतो (इयं के०) ए ते (कि के.) !! एटले JE
एते केटलुं वधु आश्चर्य छे !!!॥ ४५ ॥ or भावार्थ-आ संसारमा बधी आशाओ करतां जीववानी आशा घणी महोटी छे. केमके, आ जीवने ज्यारे ।
| छेलीवारे श्वास उपडे छे, अने डचकां आवे छे, तो पग हजु हुँजीवीश, एवी आशा रह्या करे छे; माटे कोइ | Re विद्वान पुरुष- आयु वचन छे केः
जीर्येते जीर्णवयसः ।' पुंसः केशरदावपि ||
__जीविताशा धनाशा च । कुमारीव विवर्द्धते ॥१॥ ___ अर्थ-जीर्ण थइ छे अवस्था ते जेनी, एवा पुरुषना केश तथा दांत जीर्ण थाय छे. एटले वृद्धावस्थामां माथाना | केश धोला थाय छे. एटलुंज नहि पण केटलाक नाश पण पामे छे. अने दांत पण शिथिल थाय छे. एटलुज नहि
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