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________________ वैराग्य- Tal| स्त्रीरूपे, अने [य के०] वली [जाया के०] स्त्री जे ते, भवांतरे [माया के०] मानारूपे अने (य के०) वली (पीया के) 11. भाषांतर शतकम् । पिता जे ते, भवांतरे (पुत्तो के०) पुत्ररूपे पण (जायइ के०) थाय छे. अर्थात् आ जीवनी एक सरखी स्थिति नथी । ॥ ३५॥ रहेती. इत्यादि अनवस्था जाणवी. ॥ २२ ॥ ॥ ३५॥ ___ भावार्थ:-हे जीव ! संसारमा सर्वे जीव कर्मने वश छे, माटे तेमनु स्वरूा सदाकाल एकरूपे रहेतुं नथी. एज गंसारनो विषम स्वभाव के. कारण के, जे माता छे, ते भवांतरे मातारूपेज नयी थती, परंतु तेज माता स्त्रीरूपे थाय छे. अने जे स्त्री एटले पोतानी भार्या छे ते भवांतरे भने जे स्त्री पटले पोतानी भार्या के ते भवांतरे मातारुपे थाय छे. पण भार्या रूपे उत्पन्न नयी थती, अने जे पिता छे ते भवांतरे पितारूपेज नथी थतो, परंतु पुत्ररूपे पण उत्पन्न थाय छे. माटे जेना उपर तु आज प्रीति राखीने 30 तहारो बधो जन्मारो तेनुज भरण पोषण करवामां पशुनी पेठे आ मनुष्यभवने एले गमावे के; पण एम विचार नथी करतो के, एज महारां केटलीएक वखत शत्रु थइने तेओए मने छेदन भेदन, ताडन तर्जन, घातपातादिक अत्यंत || वेदना उपजावी हशे; तोपण हुं तेना उपर सरागभावे करीने उलटो रात्रिदिवस तेनीज चिंतामा रहीने महारं धर्म- 12 ध्यान मूकीने शुं करवा खराब थ छं? एवो विचार तुं लेशमात्र पण करतो नधी. कारण के, तुं आखो जन्मारो तेमने माटे कटी कटीने मरी जडश, तोय पण जो तेमना कर्ममां सुख नथी. तो तं केम करीने सखी का तेमना कर्ममां जो द्रव्यादिकनो लाभ नथी, तो तु तेमने क्यांची लावीने आपीश ? तेम छतां कदापि तुं कुड, कपट, छल भेद, प्रपञ्च, विश्वासघात अने अन्यायादिक अनेक प्रकारनां कुकर्म करीने, महोटा मेरुपर्वत जेवडो माथे पापरुप ه للا منافقا من نفحات DD करीने सुखी करीश ? तथा TOT.r Jain Education Internal 2010_05 For Private & Personal Use Only | w w.jainelibrary.org
SR No.600040
Book TitleVairagya Shataka
Original Sutra AuthorPurvacharya
AuthorGunvinay
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages176
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size9 MB
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