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________________ बैराग्य ॥१०४॥ ___अर्थ-(जेहिं के०) जेमणे (पावपमायवसेणं के०) पापरूप प्रमादना वशे करीने (जिणधम्मो के०) जिनधर्म जे ते (न संचियो के० पोताना आत्माने विषे नधी संवय को. अर्थात् पोताना आत्मामां जिनधर्म परोबर ठसाव्यो । भाषांतर सहित il नथी. (ते के०) तेवा (वराया के०) रांक पुरुषो जे ते, एटले अज्ञान कष्टने करनारा पुरुषो जे ते (मरगंमि के०) || मरग (समुवढियंमि के०) प्राप्त थये सते (पित्था के०) पछी (सोअंति के०) शोक करे छे. के अरेरे ! आपणे कांइ ॥१४॥ पण धर्म साधन कर्या विना परलोकने विषे क्याथी सुखी थइशु!! इत्यादिक घणोज पश्चात्ताप करे छे. ।। ५४ ॥ ___भावार्थ-हे जीव ! जेवी जोइए तेवी तेने धर्मसाधन करवानी सामग्री मली, तो पण कुरुगुरना उपदे शथी | जिनआज्ञा रहित अनेक प्रकारनां अज्ञान कष्ट करी, आ लोक तथा परलोक ए प्रकारे बे लोकनुं सुख हारी गयो. | | केम के, लोकमां मानवा पूजवाना अहंकारथी, समज्या विना अज्ञान कष्ट कर्या, तेथी परलोकमां तने घणोज पश्चा ताप थशे. माटे थोडं पण जिनआणा सहित धर्मसाधन करवामां प्रमाद रहित था, अर्थात् पांव प्रकारना प्रमादना | वशथी विराम पामीने जलदीधी धर्मसाधन कर्य. ।। ५४ ॥ विधिकधिक पसारं देवः मृत्वा यत् नियम् भवति धीधीधी संसार देवो मरिऊँग जे तिरी होई ।। * १ मद, २ विषय, ३ कषाय, ४ निद्रा, भने ५ विकथा. JainEducation Internet 2010_05 For Private & Personal use only Twww.jainelibrary.org
SR No.600040
Book TitleVairagya Shataka
Original Sutra AuthorPurvacharya
AuthorGunvinay
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages176
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size9 MB
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