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________________ अञ्जन प्र. कल्प ॥ ११ ॥ Jain Education Inte सातस्स समक्खं, मज्झमिणं चेव धम्मणुद्वाणं । सिद्धिमविग्धं गच्छउ, जिणाइ नवकारओ धणियं ॥ ५ ॥ ( आर्या ) जय वीराय कहेवा० पछी कुंवा कांठे जई करवानो विधि : मंत्रयुक्त वास कुंकुम अने चंदनना छांटा नांखवा त्यार बाद नीचेना मंत्रथी प्रणवार आचमन कर. :- ॐ गुरु तवाय नमः; अर्ह आत्मतत्वाय स्वाहा; ह्रीँ विद्यातत्वाय स्वाहा; ह्रीँ पार्श्वतत्त्वाय स्वाहा, ॐ मुक्तितत्त्वाय स्वाहा । पछी अंगन्यास करवो. मंत्र : 11 ॐ ह्रीँ नमो अरिहंताणं ह्राँ शीर्ष रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्रीँ नमो सिद्धाणं ह्रीँ वदनं रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ ॐ ह्रीँ नमो आयरियाणं हूँ हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्रीँ नमो उवज्झायाणं हूँ नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्रीं नमो लोए सव्वसाहूणं पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ह्रीँ नमो ज्ञानदर्शनचारित्रेभ्यः हूः सर्वाङ्गं रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ पछी करन्यास करवो. मंत्र : - ॐ ह्रीँ अर्ह अड्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रीँ सिद्धाः तर्जनीभ्यां नमः । ॐ ह्रीँ आचार्या मध्यमाभ्यां नमः । ॐ ह्रीँ For Private & Personal Use Only ॥ ११ ॥ inelibrary.org
SR No.600016
Book TitlePratishthakalpa Anjanshalakavidhi
Original Sutra AuthorSakalchandra Gani
AuthorSomchandravijay
PublisherNemchand Melapchand Zaveri Jain Vadi Upashray Surat
Publication Year
Total Pages340
LanguageDevnagri, Gujarati
ClassificationManuscript, Ritual_text, Vidhi, Devdravya, & Ritual
File Size18 MB
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