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अञ्जन प्र. कल्प
॥१४४॥
MEKACCEMEMEमला
जह सिद्धाण पइट्ठा, समग्गलोगस्स मज्झयारंमि। आचंद सूरियं तह, होउ इमा सुपइट्ठत्ति॥१॥ (आर्या) जह सग्गस्स पइट्ठा, समग्गलोगस्स मज्झयारंमि। ,, ,, ,, ,, ,, ॥२॥ (आर्या) जह मेरुस्स पइट्ठा, दीवसमुदाण मज्झयामि। ,, ,, ,, ,, ,, ॥३॥ (आर्या) जह जम्बूस्म पइट्ठा, समत्थदीवाण मज्झयारंमि। ,, ,, ,, ,, , ॥४॥ (आर्या) जह लवणस्म पइट्ठा, समत्थउदहीण मज्झयामि।
धमाऽधम्माऽऽगासा-थिकायमयस्स मब्बलोगस्म ।
जह सासया पइट्ठा, एसा विय होउ सुपइट्ठा ॥ ६ ॥ (आर्या) पंचण्ह वि सुपइट्ठा, परमिट्ठीणं जहा सुए भणिया।
नियया अणाइ निहणा, तह एसा होउ सुपइट्ठा ॥ ७ ॥ (आर्या) धर्मदेशना:-पछी गुरुए 'प्रवचन मुद्राथी' नीचे प्रमाणे प्रतिष्ठाना गुणोनुं वर्णन करवा पूर्वक धर्मदेशना आपवी.
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॥५| (आर्या)
६ ॥१४४॥
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