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अञ्जन प्र. कल्प
॥११९॥
संवत्सरं दानवरं वराणा-माधारसारकैवचश्चरित्रम् ।
परं पवित्रं पुरुषं पुराणं, पदप्रकृष्टं सुगरिष्ठज्येष्ठम् ॥१॥ (उपजाति) 'ॐ हाँ हाँ परमाईते जिननाथाय स्नापयामीति स्वाहा।'
पंचमुष्टि लोचः-पछी महोत्सवपूर्वक इन्द्र इन्द्राणीथी परिवरित दान देता देता अशोकवृक्षनी नीचे जई 'सर्व अलंकारोथी रहित पंचमुष्टिलोच करवो.
पछी 'ॐ नमो सिद्धाणं' ए पाठ भणवो. ('सर्वविरतिनो स्वीकार.) पछी नीचेना ये श्लोको तथा मंत्र बोलबो. ( शक्रेन्द्र प्रभुजीना स्कंध उपर देवदूष्य वस्त्र स्थापन करे.) चारित्रचक्रदधतं भुवनैकपूज्यं, स्याद्वादतोयनिधि-वर्धनपूर्ण(बाल)चन्द्रम् ।
तत्त्वार्थभावपरिदर्शनवोधदीप-मैश्वर्यवर्यसुमनं विगताभिमानम् ।।१।। (वसन्त०) १ अ-लोकान्तिकदेवोनी विनंतिः--नवलोकान्तिकदेवोना नाम अने प्रभुने भावपूर्वक विनंति करे छे ते-परिशिष्ट नं.१-अ.मां आपेल छे.
१ ब-कुलमहत्तरा ( धावमाता) हितोपदेशरूप आशीर्वचन प्रभुजीने कहे छे ते परिशिष्ट-न १-क. मां आपेल छे । २ अलंकार-उतारता बोलवानो श्लोक-परिशिष्ट नं. १-ख मां आपेल छ.। ३ सर्वविरति स्वीकारतां बोलवान सूत्र- करेमि सामाइयं ' परिशिष्ट-नं. १. ग मां आपेल छ ।
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