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________________ ८४०] छक्खंडागम स्पर्शको बुद्धिसे खण्डित करनेपर जो अन्तिम खण्ड हो उसका नाम अविभागप्रतिच्छेद है। इस प्रमाणसे जितने भी स्पर्शखण्ड हों, वे सभी पृथक् पृथक् वर्ग कहे जाते हैं। वर्गमूल - वर्गकी मूल राशिको वर्गमूल कहते हैं । जैसे ४४४=१६ होते हैं, तो १६ राशिका ४ यह वर्गमूल है । वाचना - शिष्योंके पढ़ानेको, तथा जिज्ञासु जनोंके लिए आगमके मूल और अर्थक प्रदान करनेको वाचना कहते हैं। वाचनोपगत - नन्दा, भद्रा, जया और सौम्या इन चार प्रकारकी वाचनाओंके द्वारा जो श्रुत दूसरोंके ज्ञान करानमें समर्थ होता है उसे वाचनोपगत कहते हैं । विज्ञप्ति - जिसके द्वारा तर्कणा किया गया पदार्थ विशेषरूपसे जाना जावे ऐसे अवायज्ञानको विज्ञप्ति कहते हैं। विष्कम्भसूची - किसी गोलाकार क्षेत्रके मध्यमें एक ओरसे दूसरी ओर तक जितना विस्तार हो उसे विष्कम्भ सूची कहते हैं। वित्रसाबन्ध - किसीके प्रयोग विना स्वतः स्वभावसे होनेवाले बन्धको विस्रसाबन्ध कहते हैं। जैसे धर्म, अधर्म आदि द्रव्योंके प्रदेशोंका परस्परमें जो बन्ध है, या स्निग्धसे रूक्षगुणवाले पुदगलोंका जो स्वत: स्वभाव से बन्ध होता है, वह विस्रसाबन्ध है। विनसोपचय - औदारिकादि शरीरोंके पुद्गल परमाणुओंके ऊपर स्वतः स्वभावसे प्रतिसमय जो अनन्त पुद्गल परमाणु उपचित होते रहते हैं, उन्हें विस्रसोपचय कहते हैं । वेद - (श्रुतज्ञान-) वस्तु-स्वरूपके प्रतिपादक या जाननेवाले ऐसे द्वादशाङ्गरूप श्रुतको वेद कहते हैं । वेदकसम्यक्त्व - जिस सम्यग्दर्शनमें सम्यक्त्व प्रकृतिके उदयसे चल, मलिन और अमाढ दोष उत्पन्न हो, उसे वेदकसम्यक्त्व कहते हैं । इसीका दूसरा नाम क्षयोपशमसम्यक्त्व है। व्यवसाय - ईहाके विषयभूत पदार्थके व्यवसित अर्थात् निश्चित करनेवाले ज्ञानको व्यवसाय कहते हैं। यह अवायका पर्यायवाची नाम है। श्रेणी- आकाशके प्रदेशोंकी क्रमसे स्थित पंक्तिको श्रेणी कहते हैं। प्रस्तुत ग्रन्थमें श्रेणी शब्द जगच्छेणीके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है, जो कि सात राजु लम्बी एक प्रदेशपंक्ति कहलाती है । षट्स्थानपतितवृद्धि-हानि - अनन्तभागवृद्धि, असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यात गुणवृद्धि और अनन्तगुणवृद्धि इन छह प्रकारकी वृद्धियोंके होनेको षट्स्थानपतित वृद्धि कहते हैं । इसी प्रकार अनन्तभागहानि, असंख्यातभागहानि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणहानि, असंख्यातगुणहानि और अनन्तगुणहानि इन छह प्रकारकी हानियोंके होनेको षट्स्थानपतित हानि कहते हैं। जहांपर छहों प्रकारकी वृद्धि और हानि ये दोनों ही हों, उसे षट्स्थानपतितवृद्धि-हानि कहते हैं। समयप्रबद्धार्थता - एक समयमें बंधनेवाले कर्मपिण्डके वर्णन करनेवाले अनुयोगद्वारको समयप्रबद्धार्थता कहते हैं। समिलामध्य - समिला या शमिला नाम युग ( जुआँ ) की कीलीका है, जिसे देशी भाषामें सैल कहते है। दो समिलाओंका मध्यभाग मोटा और दोनों ओरका पार्श्वभाग पतला होता है, इसी प्रकार यवाकार जो रचना होती है, उसे समिलामध्य कहते हैं। सम्यक्त्वकाण्डक - सम्यग्दर्शन उत्पन्न होनेके वारोंको सम्यक्त्वकाण्डक कहते हैं। संख्यातगणवृद्धि - विवक्षित स्थानमें संख्यातगुणी वृद्धि होनेको संख्यातगणवृद्धि कहते हैं। संख्यातगणहानि - विवक्षित स्थानमें संख्यातगणी हानि होनेको संख्यातगणहानि कहते हैं। संख्यातभागपरिवृद्धि - विवक्षित स्थानमें संख्यातवें भागकी वृद्धि होनेको संख्यातभागपरिवृद्धि कहते हैं। संख्यातभागहानि - विवक्षित स्थानमें संख्यातवें भागकी हानिके होनेको संख्यातभागहानि कहते हैं। संघातनकृति - विवक्षित शरीरके परमाणुओंका निर्जराके विना जो संचय होता है, उसे संघातनकृति कहते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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