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________________ ८२८ ] पंक्ति २२ ६५३ ६५४ पृष्ठ ६४५ ६४६ ४ ६४८ १९ बज्झमाणिया उदिण्णा च ६४८ २७ उदीरणा ६५० ८ उदिष्णफलपत्तविवागवेयणा ६५० १५ ६५० ६५० २५ अशुद्ध पाठ वेदन होता है वह उक्त ६५१ २ है, कारण ९ अनुयोगाद्वार ६ चउव्विहोदव्वदो इन स्थानों में असंख्यातगुण कर्मों क २४ अवट्टिदा अवस्थित Jain Education International ६५६ १६ ६६० २३ ६६२ ३ संखेज्जगुणन्भहिया असंखेज्ज० १८ संखेज्जब्भागवहिया आदि स्थानों में ६६२ ६६४ ३ वेदनीयकी अपेक्षा असंख्यातगुणी होती है चउव्विहे जिस ज्ञानावरणीयकी उकसिया ६६४ २७ ६६९ २९ ६७० २४ ६७१ १ ६७२ २ ६७२ १२ उकसा ६७२ २३ इस प्रकार ६७२ २४ सत्ताणं ६७६ ८ ६७८ ८ छक्खंडागम ६८१ ३ ६८२ १४ ६८३ १५ दुभागूणो ६८३ १७ द्वितीय भाग अंतरायवेयणा छण्णं वेयणा प्रबद्धार्थ से उक्त तीन गुणित - सहस्सओ शुद्ध पाठ वेदन होता है, या वेदन किया जावेगा, वह इस बज्झमाणिया च उदिण्णा च उदिण्णा उदिण्णा फलपत्तविवागा वेयणा क्योंकि अदा अस्थित है, इस कारण अनुयोगद्वार चउव्वहो - दव्वदो इन चार स्थानों में असंख्यातगुणी संखेज्जगुणन्भहिया वा असंखेज्ज • संखेज्जभागब्भहिया आदि चार स्थानोंमें वेदनीयकी वेदना असंख्यातगुणी अधिक होती है विहो जिस जीवके ज्ञानावरणीयकी उकस्सिया उक्कस्सा इसी प्रकार सत्तणं अंतराइयवेणा छष्णं कम्माणं णामवज्जाणं प्रबद्धार्थतासे गुणित - सहस्सिओ दुभागो दो भाग For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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