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________________ ७७४ ] छक्खंडागमे वग्गणा-खंड [ ५, ४, ५३१ क्षेत्रहानिप्ररूपणाकी अपेक्षा औदारिकशरीरके जो एकप्रदेश क्षेत्रावगाही वर्गणाके द्रव्य हैं वे बहुत हैं और वे अनन्त विस्रसोपचयोंसे उपचित हैं ॥ ५२८ ॥ जो द्विप्रदेशी क्षेत्रावगाही वर्गणाके द्रव्य हैं वे विशेष हीन हैं और वे अनन्त विस्रसोपचयोंसे उपचित हैं ॥५२९॥ इसी प्रकार त्रिप्रदेशी, चतुःप्रदेशी, पंचप्रदेशी, षट्प्रदेशी, सप्तप्रदेशी, अष्टप्रदेशी, नवप्रदेशी, दसप्रदेशी, संख्यातप्रदेशी और असंख्यातप्रदेशी क्षेत्रावगाही वर्गणाके जो द्रव्य हैं वे विशेष हीन हैं और वे अनन्तानन्त विस्रसोपचयोंसें उपचित हैं ।। ५३० ॥ तदो अंगुलस्स असंखेज्जदिभागं गंतूण तेसिं चउविहा हाणी असंखेज्जभागहाणी संखेज्जभागहाणी संखेज्जगुणहाणी असंखेज्जगुणहाणी ॥ ५३१॥ उससे अंगुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण स्थान जाकर उनकी चार प्रकारकी हानि होती है- असंख्यातभागहानि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणहानि और असंख्यातगुणहानि ॥५३१॥ एवं चदुण्णं सरीराणं ॥ ५३२ ॥ इसी प्रकार वैक्रियिक आदि शेष चार शरीरोंकी क्षेत्रहानि समझना चाहिए ॥ ५३२ ॥ कालहाणीपरूवणदाए ओरालियसरीरस्स जे एगसमयढिदिवग्गणाए दव्वा ते बहुआ अणंतेहि विस्सासुवचएहि उवचिदा ॥ ५३३ ॥ जे दुसमयढिदिवग्गणाए दव्वा ते विसेसहीणा अणंतेहि विस्सासुवचएहि उवचिदा ।। ५३४ ॥ एवं ति-चदु-पंच-छ-सत्त-अट्ठणव-दस-संखेज्ज-असंखेज्जसमयढिदिवग्गणाए दव्वा ते विसेसहीणा अणंतेहि विस्सासुवचएहि उवचिदा ॥ ५३५ ॥ कालहानिप्ररूपणाकी अपेक्षा औदारिकशरीरके जो एक समयस्थितिवाली वर्गणाके द्रव्य हैं वे बहुत हैं और वे अनन्त विस्रसोपचयोंसे उपचित हैं ।। ५३३ ॥ जो दो समयस्थितिवाली वर्गणाके द्रव्य हैं वे विशेष हीन हैं और वे अनन्त विस्रसोपचयोंसे उपचित हैं ।। ५३४ ॥ इस प्रकार तीन, चार, पांच, छह, सात, आठ, नौ, दस, संख्यात और असंख्यात समय तक स्थित रहनेवाली वर्गणाके जो द्रव्य हैं वे विशेष हीन हैं और वे प्रत्येक अनन्त विस्रसोपचयोंसे उपचित हैं ।। तदो अंगुलस्स असंखेज्जदिभागं गंतूण तेसिं चउचिहा हाणी-असंखेज्जभागहाणी संखेज्जभागहाणी संखेज्जगुणहाणी असंखेज्जगुणहाणी ।। ५३६ ।।। उसके आगे अंगुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण स्थान जाकर उनकी चार प्रकारकी हानि होती है- असंख्यातभागहानि, संख्यातभागहानि, संख्यातगुणहानि और असंख्यातगुणहानि ॥५३६।। एवं चदुण्णं सरीराणं ॥ ५३७ ॥ इसी प्रकार वैक्रियिक आदि शेष चार शरीरोंकी प्रकृत प्ररूपणा जाननी चाहिए ॥५३७॥ भावहाणिपरूवणदाए ओरालियसरीरस्स जे एयगुणजुत्तवग्गणाए दव्वा ते बहुआ अणंतेहि विस्सासुवचएहि उवचिदा ॥ ५३८ ॥ जे दुगुणजुत्तवग्गणाए दव्या ते विसेसहीणा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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