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________________ ७४ ] छक्खंडागम उत्कृष्ट प्रत्येक शरीरद्रव्यवर्गणाके ऊपर एक परमाणुकी वृद्धि होनेपर दूसरी सर्वजघन्य ध्रुवशून्यवर्गणा प्राप्त होती है । पुनः एक एक परमाणुकी क्रमसे वृद्धि करनेपर सब जीवोंसे अनन्तगुणितस्थान आगे जानेपर उत्कृष्ट ध्रुवशून्यवर्गणा प्राप्त होती है । यह वर्गणा भी सदा शून्यरूपसे अवस्थित रहती है । यह अठारहवीं वर्गणा है । - उत्कृष्ट ध्रुवशून्यवर्गणाके ऊपर एक परमाणुकी वृद्धि होने पर सबसे जघन्य बादर निगोदवर्गणा प्राप्त होती है । यह वर्गणा क्षपितकर्मांशिक विधिसे आये हुए क्षीणकषायी जीवके बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समयमें प्राप्त होती है । इसका एक कारण तो यह है कि जो क्षपित कर्माशिक विधिसे आया हुआ जीव होता है, उसके कर्म और नोकर्मका संचय उत्तरोत्तर कम होता जाता है। दूसरे यह नियम है कि क्षपकश्रेणीपर चढ़नेवाले जीवके विशुद्धिके कारण ऐसी विशिष्ट शक्ति उत्पन्न होती है कि जिससे उस जीवके बारहवें गुणस्थानमें पहुंचनेपर प्रथम समयमें ' उसके शरीर-स्थित अनन्त बादरनिगोदिया जीव मरते हैं। दूसरे समयमें उससे भी विशेष अधिक अनन्त बादर निगोदिया जीव मरते हैं। इस प्रकार आवली पृथक्त्त्वप्रमाण काल तक प्रतिसमय उत्तरोत्तर विशेष अधिक, विशेष अधिक बादर निगोदिया जीव मरते हैं। उससे आगे क्षीणकषायके कालमें आवलीके असंख्यातवें भागप्रमाण काल शेष रहनेतक संख्यात भाग अधिक, संख्यात भाग अधिक बादर निगोदिया जीव प्रतिसमय मरते हैं। तदनन्तर समयमें उससे असंख्यातगुणित बादर निगोदिया जीव मरते हैं। इसी क्रमसे बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समय तक उसके शरीरमें स्थित बादर निगोदिया जीव प्रतिसमय असंख्यात गुणित मरते हैं। इस प्रकार बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समयमें मरनेवाले जितने बादर निगोदिया जीव होते हैं, उनके विलासोपचयसहित कर्म और नोकर्मवर्गणाओंके समुदायको एक बादर निगोदवर्गणा कहते हैं। यतः यह अन्य बादर निगोदवर्गणाओंकी अपेक्षा सबसे जघन्य होती है, अतः क्षपितकर्माशिक जीवके बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समयमें जघन्य बादर निगोदवर्गणा कही गई है। स्वयम्भूरमणद्वीपके कर्मभूमिसम्बन्धी भागमें उत्पन्न हुई मूलीके शरीरमें उत्कृष्ट बादर निगोदवर्गणा होती है । मध्यमें नाना जीवोंके शरीरोंके आधारसे ये बादर निगोदवर्गणाएं जघन्यसे उत्कृष्ट तक असंख्य प्रकारकी होती हैं । यह उन्नीसवीं वर्गणा है । उत्कृष्ट बादर निगोदवर्गणामें एक परमाणुकी वृद्धि होनेपर तीसरी सर्व जघन्य ध्रुवशून्यवर्गणा प्राप्त होती है । पुनः इसके ऊपर एक एक परमाणुकी वृद्धि करते हुए सब जीवोंसे अनन्तगुणित स्थान आगे जानेपर उत्कृष्ट ध्रुवशून्यवर्गणा प्राप्त होती है। यह वर्गणा भी शून्यरूपसे अवस्थित रहती है । यह बीसवीं वर्गणा है । उक्त उत्कृष्ट ध्रुवशून्यवर्गगाके ऊपर एक परमाणुकी वृद्धि करनेपर सर्वजघन्य सूक्ष्मनिगोदवर्गणा प्राप्त होती है । यह वर्गणा क्षपितकांशिकविधिसे और क्षपितघोलमानविधिसे आये हुए Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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