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________________ ७२८] छक्खंडागमे वग्गणा-खंड [५, ६, ४१ वा गोवुराणं वा तोरणाणं वा से कडेण वा लोहेण वा रज्जुणा वा बब्भेण वा दम्भेण वा जे चामण्णे एवमादिया अण्णदव्वाणमण्णदव्वेहिं आलावियाणं बंधो होदि सो सव्वो आलावणबंधो णाम ॥ ४१ ॥ जो आलापनबन्ध है उसका यह निर्देश है-- जो भारी बोझके ढोनेमें समर्थ गाडियोंका, जहाजोंका, घोडा अथवा खच्चरोंके द्वारा खींची जानेवाली गाडियोंका, छोटी गाडियोंका, गिल्लियोंका रथोंका, चक्रवर्ती आदिके चढ़ने योग्य और सब आयुधोंसे परिपूर्ण ऐसे स्यन्दनोंका, पालकियोंका, गृहोंका, भवनोंका, गोपुरोंका और तोरणोंका, काष्ठसे, लोहसे, रस्सीसे, चमड़ेकी रस्सीसे और दर्भसे जो बन्ध होता है वह तथा इनको आदि लेकर और भी जो अन्य द्रव्योंसें आलापित परस्पर सम्बन्धको प्राप्त हुए अन्य द्रव्योंका बन्ध होता है वह सब आलापनबन्ध है ॥ ४१ ॥ जो सो अल्लीवणबंधो णाम तस्स इमो णिदेसो- से कडयाणं वा कुड्डाणं वा गोवरपीडाणं वा पागाराणं वा साडियाणं वा जे चामण्णे एवमादिया अण्णदव्वाणमण्णदव्वेहिं अल्लीविदाणं बंधो होदि सो सव्वो अल्लीवणबंधो णाम ॥ ४२ ॥ जो अल्लीवणबन्ध है उसका यह निर्देश इस प्रकार है-कटकोंका, कुड्डोंका, गोवरपीडोंका, प्राकारोंका और शाटिकाओंका तथा इनको आदि लेकर और भी जो दूसरे पदार्थ हैं उनका जो अन्य द्रव्योंसे सम्बन्धको प्राप्त हुए अन्य द्रव्योंका बन्ध होता है वह सब अल्लीवणबन्ध है ॥ ४२ ॥ ___ आलापनबन्धमें जो शकटादिकोंका बन्ध होता है वह काष्ठ, लोह अथवा रस्सी आदि अन्य द्रव्योंके आश्रयसे होता है; किन्तु प्रकृत अल्लीपनबन्धमें कटकादिकोंका वह बन्ध अन्य पृथग्भूत द्रव्योंके बिना ही परस्पर होता है । यह इन दोनों बन्धोंमें भेद समझना चाहिये । जो सो संसिलेसबंधो णाम तस्स इमो णिदेसो-जहा कट्ट-जदूणं अण्णोणसंसिलेसिदाणं बंधो संभवदि सो सव्वो संसिलेसबंधो णाम ॥ ४३ ॥ जो संश्लेषबन्ध है उसका निर्देश इस प्रकार है- जैसे परस्पर संश्लेषको प्राप्त हुए काष्ठ और लाखका जो बन्ध होता है वह सब संश्लेषबन्ध है ॥ ४३ ।। जिस प्रकार आलापनबन्धमें बध्यमान पुद्गलोंके अतिरिक्त अन्य लोह वे और रस्सी आदिकी आवश्यकता होती है तथा अल्लीपनबन्धमें पानीकी आवश्यकता होती है उस प्रकार प्रकृत संश्लेषबन्धमें जतु (लाख) और काष्ठ आदि बध्यमान पुद्गलोंके अतिरिक्त अन्य किसीकी आवश्यकता नहीं रहती, यह इस बन्धकी विशेषता समझनी चाहिये । जो सो सरीरबंधो णाम सो पंचविहो- ओरालियसरीरबंधो वेउब्वियसरीरबंधो आहारसरीरबंधो तेयासरीरबंधो कम्मइयसरीरबंधो चेदि ॥४४॥ जो वह शरीरबन्ध है वह पांच प्रकारका है- औदारिकशरीरबन्ध, वैक्रियिकशरीरबन्ध, आहारकशरीरबन्ध, तैजसशरीरबन्ध और कार्मणशरीरबन्ध ॥ ४४ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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