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________________ ७२६] छक्खंडागमे वग्गणा-खंडं [ ५, ६, ३२ अर्ध भागसे लेकर चतुर्थ भाग तक धर्मास्तिकदेश कहा जाता है, ऐसे धर्मास्तिकदेशोंका जो अपने अवयवोंके साथ सम्बन्ध है उसे धर्मास्तिकदेशबन्ध जानना चाहिये । उक्त धर्मास्तिकायके चतुर्थ भागसे सब ही अवयवोंका नाम धर्मास्तिकप्रदेश तथा उनका जो परस्पर सम्बन्ध है उसका नाम धर्मास्तिकप्रदेशबन्ध है। यहीं प्रक्रिया अधर्मास्तिकाय और आकाशास्तिकायके सम्बन्धमें भी जानना चाहिये । इन तीनों ही अस्तिकायोंकेप्रदेशोंका जो परस्पर सम्बन्ध है उस सबको अनादिविस्रसाबन्ध समझना चाहिये। जो सो थप्पो सादियविस्ससाबंधो णाम तस्स इमो णिदेसो- वेमादा णिद्धदा वेमादा ल्हुक्खदा बंधो ॥ ३२ ॥ जो वह सादिविस्रसाबन्ध स्थगित किया गया था उसका निर्देश इस प्रकार है- विसदृश स्निग्धता और विसदृश रूक्षता बन्ध है-- बन्धकी कारण होती है ॥ ३२ ॥ यहां मादा शब्दसे सदृशता और विमादा शब्दसे विसदृशता अभिप्रेत है, ऐसा समझना चाहिये। समणिद्धदा समल्हुक्खदा भेदो ॥ ३३ ॥ समान सिधता और समान रूक्षता भेद है ॥ ३३ ॥ अभिप्राय यह है कि स्निन्ध परमाणुओंका अन्य स्निग्ध परमाणुओंके साथ तथा रूक्ष परमाणुओंका अन्य रूक्ष परमाणुओंके साथ बन्ध नहीं होता है। णिद्धणिद्धाण बझंति ल्हुक्ख-ल्हुक्खा य पोग्गला । णिद्ध-ल्हुक्खा य बझंति रूवारूवी य पोग्गला ॥ ३४ ॥ स्निग्ध पुद्गलपरमाणु अन्य स्निग्ध पुद्गलपरमाणुओंके साथ नहीं बंधते । इसी प्रकार रूक्ष पुद्गलपरमाणु अन्य रूक्ष पुद्गलपरमाणुओंके साथ नहीं बंधते । किन्तु सदृश और विसदृश ऐसे स्निग्ध और रूक्ष पुद्गलपरमाणु परस्पर बंधको प्राप्त होते हैं ॥ ३४॥ अभिप्राय यह है कि समान गुणवाले स्निग्ध परमाणुओंका अन्य स्निग्ध परमाणुओंके साथ तथा समान गुणवाले रूक्ष परमाणुओंका अन्य रूक्ष परमाणुओंके साथ परस्पर बन्ध नहीं होता है । परन्तु स्निग्ध और रूक्ष पुद्गलपरमाणुओंका, चाहे वे रूपी- गुणाविभागप्रतिच्छदोंसे समानहों और चाहे अरूपी- उक्त गुणाविभागप्रतिच्छेदोंसे असमान- हों तो भी उनका परस्पर बन्ध होता है। वेमादाणिद्धदा वेमादाल्हुक्खदा बंधो ॥ ३५ ॥ दो गुणमात्र स्निग्धता और दो गुणमात्र रूक्षता परस्पर बन्धकी कारण है ॥ ३५ ॥ अभिप्राय यह है कि जो स्निग्ध परमाणु उस स्निग्धतामें दो अविभागप्रतिच्छेदों अधिक और हीन हैं उनका परस्पर बन्ध होता है। यही क्रम रूक्ष परमाणुओंके भी परस्पर बन्धमें जानना चाहिये। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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