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________________ ४, २, १६, ८ ] वेयणमहाहियारे वेयणअप्पाबहुगं [ ६८५ केवलिसमुद्घातसे समुद्घातको प्राप्त होकर सर्व लोकको प्राप्त हुए अन्यतर केवलीके इस क्षेत्रप्रत्याससे समयप्रबद्धार्थकता प्रकृतियोंको गुणित करनेपर जो प्राप्त हो उतनी मात्र वेदनीय कर्मकी एक एक प्रकृति होती है । ये प्रकृतियां सब प्रकृतियोंके कितनेवें भाग प्रमाण हैं ? ॥१९॥ वे उनके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं ॥ २० ॥ एवमाउअ-णामा-गोदाणं ॥ २१॥ इसी प्रकार आयु, नाम और गोत्र कर्मके सम्बन्धमें कहना चाहिये ॥ २१ ॥ ॥ वेदनाभागाभागविधान अनुयोगद्वार समाप्त हुआ ॥ १५ ॥ १६. वेयणअप्पाबहुगं वेयणअप्पाबहुए त्ति ॥१॥ अब वेदना अल्पबहुत्त्वका अधिकार है ॥ १ ॥ तत्थ इमाणि तिण्णि अणियोगद्दाराणि णादव्याणि भवंति-पयडिअट्ठदा समयपबद्धट्ठदा खेत्तपच्चासए त्ति ॥२॥ उसमें ये तीन अनुयोगद्वार ज्ञातव्य है- प्रकृत्यर्थता, समयप्रबद्धार्थता और क्षेत्रप्रत्यास ॥२॥ पयडिअट्ठदाए सव्वत्थोवा गोदस्स कम्मस्स पयडिओ ॥३॥ प्रकृत्यर्थताकी अपेक्षा गोत्र कर्मकी प्रकृतियां सबसे स्तोक हैं ॥ ३ ॥ वेयणीयस्स कम्मस्स पयडीओ तत्तियाओ चेव ॥४॥ वेदनीय कर्मकी प्रकृतियां उतनी ही हैं ।। ४ ॥ आउअस्स कम्मस्स पयडीओ संखेज्जगुणांओ ॥५॥ आयु कर्मकी प्रकृतियां उनसे संख्यातगुणी हैं ॥ ५ ॥ अंतराइयस्स कम्मस्स पयडीओ विसेसाहियाओ ॥६॥ अन्तराय कर्मकी प्रकृतियां उनसे विशेष अधिक हैं ॥ ६ ॥ मोहणीयस्स कम्मस्स पयडीओ संखेज्जगुणाओ॥७॥ मोहनीय कर्मकी प्रकृतियां उनसे संख्यातगुणी हैं ॥ ७ ॥ णामस्स कम्मस्स पपडीओ असंखेज्जगुणाओ ॥ ८ ॥ नामकर्मकी प्रकृतियां उनसे असंख्यातगुणी हैं ॥ ८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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