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________________ ४, २, १५, ९] वेयणमहाहियारे वेयणभागाभागविहाणं [६८३ वेदनीय कर्मकी कितनी प्रकृतियां हैं ॥ ४९॥ केवलिसमुद्घातसे समुद्घातको प्राप्त होकर सर्व लोकको प्राप्त हुए अन्यतर केवलीके जो वेदनीय कर्मकी एक एक प्रकृति होती है ॥ ५० ॥ उसे क्षेत्रप्रत्याससे गुणित करनेपर वेदनीय कर्मकी क्षेत्रप्रत्यास प्रकृतियोंका प्रमाण होता है ॥ ५१ ॥ उसकी इतनी प्रकृतियां हैं ।। ५२ ॥ एवमाउअ-णामा-गोदाणं ॥५३॥ इसी प्रकार आयु, नाम और गोत्र कर्मोंके सम्बन्धमें भी प्रकृत प्ररूपणा जाननी चाहिये ॥ ॥ वेदनापरिमाणविधान अनुयोगद्वार समाप्त हुआ ॥ १४ ॥ १५. वेयणभागाभागविहाणं वेयणभागाभागविहाणे त्ति ॥१॥ अब वेदना भागाभागविधान अनुयोगद्वार अधिकारप्राप्त है ॥ १ ॥ तत्थ इमाणि तिण्णि अणियोगद्दाराणि-पयडिअट्ठदा समयपबद्धट्टदा खेत्तपच्चासे त्ति ॥ २॥ उसमें ये तीन अनुयोगद्वार हैं- प्रकृत्यर्थता, समयप्रबद्धार्थता और क्षेत्रप्रत्यास ॥ २ ॥ पयडिअट्ठदाए णाणावरणीय -दसणावरणीयकम्मस्स पयडीओ सव्वपयडीणं केवडियो भागो ॥ ३ ॥ दुभागूणो देसूणो ॥ ४ ॥ प्रकृत्यर्थतासे ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय कर्मकी प्रकृतियां सब प्रकृतियोंके कितने वें भाग प्रमाण हैं ? ॥ ३ ॥ वे सब प्रकृतियोंके कुछ कम द्वितीय भाग प्रमाण हैं ॥ ४ ॥ वेयणीय-मोहणीय-आउअ-णामा-गोद-अंतराइयस्स कम्मस्स पयडीओ सव्वपयडीणं केवडियो भागो १॥५॥ असंखेज्जदिभागो ॥ ६ ॥ वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम और गोत्र और अन्तराय कर्मकी प्रकृतियां सब प्रकृतियोंके कितने भाग प्रमाण हैं ? ॥ ५ ॥ वे उनके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं ॥ ६ ॥ समयपबद्धट्ठदाए ॥७॥ अब समयप्रबद्धार्थका अधिकार है ॥ ७ ॥ णाणावरणीय-दसणावरणीयकम्मस्स एक्केक्का पयडी तीसं तीसं सागरोवमकोडाकोडीओ समयपबद्धट्ठदाए गुणिदाए सव्वपयडीणं केवडिओ भागो ?॥८॥ दुभागो देसूणो ॥९॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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