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________________ ६५२ ] [४, २, १२, १ छक्खंडागमे वेयणाखंड सद्दणयस्स अवत्तव्वं ॥१२॥ शब्द नयकी अपेक्षा वह अवक्तव्य है ॥ १२ ॥ ॥ इस प्रकार वेदनागतिविधान अनुयोगद्वार समाप्त हुआ ॥ ११ ॥ १२. वेयणअणंतरविहाणं वेयणअणंतरविहाणे त्ति ॥१॥ वेदना-अनन्तरविधान अनुयोगद्वार अधिकार प्राप्त है ॥ १ ॥ णेगम-ववहाराणं णाणावरणीयवेयणा अणंतरबंधा ॥२॥ परंपरबंधा ॥३॥ तदुभयबंधा ॥४॥ नैगम और व्यवहार नयकी अपेक्षा ज्ञानावरणीयवेदना अनन्तरबन्ध है ॥ २ ॥ वह परम्पराबन्ध भी है ॥ ३ ॥ तथा वह तदुभयबन्ध भी है ॥ ४ ॥ __ कार्मणवर्गणा स्वरूपसे स्थित पुद्गलस्कन्ध मिथ्यादर्शनादि कारणोंके द्वारा जब कर्म पर्यायको प्राप्त होते हैं तब उनका बन्ध उक्त पर्यायसे परिणत होनेके प्रथम समयमें अनन्तरबन्ध कहा जाता है । वे चूंकि कार्मण वर्गणारूप पर्यायके छोड़नेके अनन्तर समयमें ही कर्म पर्यायसे परिणत होते हैं इसीलिये उनके बन्धको अनन्तरबन्धता कही गई है। बन्धके द्वितीय समयसे लेकर कर्म-पुद्गलस्कन्ध और जीवप्रदेशोंका जो बन्ध होता है वह परम्पराबन्ध कहलाता है। चूंकि उन कर्म-पुद्गलोंका बन्ध प्रथम समयमें होता है तथा उन्हींका वह बन्ध द्वितीय और तृतीय आदि समयोंमें भी निरन्तर होता है, इसी लिये उस बन्धको परम्पराबन्ध कहा जाता है। तथा जीव द्वारा चूंकि उन दोनोंमें एकता पायी जाती है, इसीलिये उनके बन्धको तदुभयबन्धता भी कही जाती है । एवं सत्तणं कम्माणं ॥५॥ इसी प्रकार नैगम और व्यवहार नयकी अपेक्षा शेष सात कर्मोंके विषयमें भी जानना चाहिये ॥५॥ संगहणयस्स णाणावरणीयवेयणा अणंतरबंधा ॥६॥ परंपरबंधा ॥ ७ ॥ संग्रहनयकी अपेक्षा ज्ञानावरणीयवेदना अनन्तरबन्ध है ॥ ६ ॥ तथा वह परम्पराबन्ध भी है ॥ ७ ॥ एवं सत्तण्णं कम्माणं ॥ ८॥ इसी प्रकार संग्रहनयकी अपेक्षा शेष सात कर्मोके विषयमें भी प्ररूपणा करनी चाहिये । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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