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________________ ६०६ ] छक्खंडागमे वेयणाखंड ज - द्विदिबंध विसेसाहिओ ॥ २२३ ॥ उससे ज-स्थितिबन्ध विशेष अधिक है ।। २२३ ॥ जो उक्कस्यं दाहं गच्छदि सा ट्ठिदी संखेज्जगुणा ॥ २२४ ॥ उसमें जिसके कारण प्राणी उत्कृष्ट दाहको प्राप्त होता है वह स्थिति संख्यातगुणी है ॥ दाहका अर्थ संक्लेश है । अतः उत्कृष्ट दाहसे यहां उत्कृष्ट स्थितिबन्धके कारणभूत उत्कृष्ट संकेशको समझना चाहिये । अंतोकोडाकोडी संखेज्जगुणा ।। २२५ ॥ उससे अन्तःकोड़ाकोडिका प्रमाण संख्यातगुणा है || २२५ ॥ सादस्स बिट्ठाणियजवमज्झस्स उवरि एयंतसागारपाओग्गट्टाणाणि ।। २२६ ॥ उससे सातावेदनीयके द्विस्थानिक यवमध्यके ऊपरके एकान्तत साकार उपयोगके योग्य स्थान संख्यातगुणे हैं ॥ २२६ ॥ सादस्स उक्कस्सओ ट्ठिदिबंधो विसेसाहिओ ॥ २२७ ॥ उनसे सातावेदनीयका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध विशेष अधिक है ।। २२७ ॥ ज - द्विदिबंधो विसेसाहियो ॥ २२८ ॥ उससे ज-स्थितिबन्ध विशेष अधिक है ।। २२८ ॥ दाही विसेसाहिया ।। २२९ ।। उससे दाहस्थिति विशेष अधिक है ।। २२९ ॥ [ ४, २, ६, २२३ असादस्स चउट्टाणियजवमज्झस्स उवरिमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि ।। २३० ॥ उससे असातावेदनीयके चतुःस्थानिक यवमध्यके ऊपरके स्थान विशेष अधिक हैं | असादस्स उक्कस्स द्विदिबंधो विसेसाहिओ ।। २३१ ॥ उनसे असातावेदनीयका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध विशेष अधिक है । २३१ ॥ ज-ट्ठिदिबंधो विसेसाहिओ ॥ २३२ ॥ उससे ज-स्थितिबन्ध विशेष अधिक है ।। २३२ ॥ एदेण अट्ठपदेण सव्वत्थोवा सादस्स चउट्ठाणबंधा जीवा ॥ २३३ ॥ इस-अर्थपदके आश्रयसे सातावेदनीयके चतुःस्थानबन्धक जीव सबसे स्तोक हैं ॥२३३॥ तिट्ठाणबंधा जीवा संखेज्जगुणा ॥ २३४ ॥ त्रिस्थान बन्धक जीव संख्यातगुणे हैं ॥ २३४ ॥ बिट्ठाणबंधा जीवा संखेज्जगुणा ॥ २३५ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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