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________________ १, २, ६, १६०] वेयणमहाहियारे वेयणकालविहाणे ट्ठिदिबंधझवसाणपरूवणा [५९९ जहणिया आबाहा संखेज्जगुणा ॥ १४८॥ जघन्य आबाधा संख्यातगुणी है ॥ १४८ ॥ उक्कस्सिया आबाहा विसेसाहिया ॥ १४९ ॥ उत्कृष्ट आबाधा विशेष अधिक है ॥ १४९ ॥ णाणापदेसगुणहाणिट्ठाणंतराणि असंखेज्जगुणाणि ॥ १५० ॥ नानाप्रदेशगुणहानिस्थानान्तर असंख्यातगुणे है ॥ १५० ॥ एयपदेसगुणहाणिहाणंतरमसंखेज्जगुणं ॥ १५१ ॥ एकप्रदेशगुणहानिस्थानान्तर असंख्यातगुणा है ।। १५१ ॥ एयमबाधाकंदयमसंखेज्जगुणं ॥ १५२ ॥ एक आबाधाकाण्डक असंख्यातगुणा है ॥ १५२ ॥ ठिदिबंधट्ठाणाणि असंखेज्जगुणाणि ॥ १५३ ॥ स्थितिबन्धस्थान असंख्यातगुणे हैं ॥ १५३ ॥ जहण्णओ द्विदिबंधो संखेज्जगुणो ॥ १५४ ॥ जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है ॥ १५४ ॥ उक्कस्सओ हिदिबंधो विसेसाहिओ ॥ १५५ ॥ उत्कृष्ट स्थितिबन्ध विशेष अधिक है ॥ १५५ ॥ एइंदियबादर-सुहुम-पज्जत्त-अपज्जत्तयाणं सत्तण्हं कम्माणं आउववज्जाणमाबाहट्ठाणाणि आबाहाकंदयाणि च दोवि तुल्लाणि थोवाणि ॥ १५६ ॥ __ बादर व सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त-अपर्याप्त जीवोंके आयुको छोड़कर शेष सात कर्मोके आबाधास्थान और आबाधाकाण्डक दोनों ही तुल्य व स्तोक हैं ॥ १५६ ॥ जहणिया आवाहा असंखेज्जगुणा ॥ १५७ ॥ जघन्य आबाधा असंख्यातगुणी है ॥ १५७ ॥ उक्कस्सिया आवाहा विसेसाहिया ॥ १५८ ॥ उत्कृष्ट आबाधा विशेष अधिक है ॥ १५८ ॥ णाणापदेसगुणहाणिट्ठाणंतराणि असंखेज्जगुणाणि ॥ १५९ ॥ नानाप्रदेशगुणहानिस्थानान्तर असंख्यातगुणे हैं ॥ १५९ ॥ एयपदेसगुणहाणिट्ठाणंतरमसंखेज्जगुणं ॥ १६० ॥ एकप्रदेश गुणहानिस्थानान्तर असंख्यातगुणा है ॥ १६० ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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