SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 722
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ४, २, ६, १३५] वेयणमहाहियारे वेयणकालविहाणे अप्पाबहुअपरूवणा [५९७ अप्पाबहुएत्ति ॥ १२३ ॥ अब अल्पबहुत्त्व अनुयोगद्वारका अधिकार प्राप्त है ॥ १२३ ।। पंचिदियाणं सण्णीणं मिच्छाइट्ठीणं पज्जत्तापज्जत्ताणं सत्तण्हं कम्माणमाउववज्जाणं सव्वत्थोवा जहणिया आवाहा ॥ १२४ ॥ संज्ञी, मिथ्यादृष्टि, पर्याप्तक व अपर्याप्तक पंचेन्द्रिय जीवोंके आयुको छोड़कर शेष सात कर्मोकी जघन्य आबाधा सबसे स्तोक है ॥ १२४ ।। आबाहट्ठाणाणि आबाहाकंदयाणि च दोवि तुल्लाणि संखेज्जगुणाणि ॥ १२५॥ आबाधास्थान और आबाधाकाण्डक दोनों ही तुल्य व संख्यातगुणे हैं ॥ १२५ ॥ उक्कस्सिया आबाहा विसेसाहिया ॥ १२६ ॥ उनसे उत्कृष्ट आबाधा विशेष अधिक है ॥ १२६ ॥ णाणापदेसगुणहाणिट्ठाणंतराणि असंखेज्जगुणाणि ॥ १२७ ॥ नानाप्रदेशगुणहानिस्थानान्तर असंख्यातगुणे हैं ॥ १२७ ।। एयपदेसगुणहाणिट्ठाणंतरमसंखेज्जगुणं ॥ १२८॥ एकप्रदेशगुणहानिस्थानान्तर असंख्यातगुणा है ॥ १२८ ॥ एयमाबाहाकंदयमसंखेज्जगुणं ॥ १२९ ॥ एक आबाधाकाण्डक असंख्यातगुणा है ॥ १२९ ॥ जहण्णओ द्विदिबंधो असंखेज्जगुणो ॥१३० ॥ जघन्य स्थितिबन्ध असंख्यातगुणा है ॥ १३० ॥ ठिदिबंधट्ठाणाणि संखेज्जगुणाणि ॥ १३१ ॥ स्थितिबन्धस्थान संख्यातगुणे हैं ॥ १३१ ॥ उक्कस्सओ द्विदिबंधो विसेसाहिओ ॥ १३२ ॥ उत्कृष्ट स्थितिबन्ध विशेष अधिक है ॥ १३२॥ पंचिदियाणं सण्णीमसण्णीणं पज्जत्तयाणमाउअस्स सव्वत्थोवा जहणिया आबाहा ॥ संज्ञी व असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवोंके आयुकी जघन्य आबाधा सबसे स्तोक है ॥१३३॥ जहण्णओ द्विदिबंधो संखेज्जगुणो ॥ १३४ ॥ जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है ॥ १३४ ॥ आबाहाट्ठाणाणि संखेज्जगुणाणि ॥ १३५ ॥ आबाधास्थान संख्यातगुणे हैं ।। १३५ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy