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________________ ५१६] छक्खंडागमे वेयणाखंड [४, १, १६ णमो विज्जाहराणं ॥१६॥ विद्याधर जिनोंको नमस्कार हो ॥ १६ ॥ जातिविद्या, कुलविद्या और तपविद्याके भेदसे विद्या तीन प्रकारकी है। उनमें मातृपक्षसे जो विद्यायें प्राप्त होती हैं वे जातिविद्यायें तथा पितृपक्षसे प्राप्त होनेवाली विद्यायें कुलविद्यायें कहलाती हैं । महोपवासादिरूप तपश्चरणके द्वारा सिद्ध की जानेवाली विद्याओंको तपविद्यायें समझना चाहिये । ये विद्यायें जिनके होती हैं वे विद्याधर कहलाते हैं। उनमेंसे विजयाध पर्वतपर रहनेवाले असंयमी विद्याधरोंको छोड़कर जिन्होंने विद्याओंके परित्यागपूर्वक संयमको ग्रहण कर लिया है उनको तथा जो सिद्ध हुई विद्याओंके उपयोगकी इच्छा नहीं करते हैं उन विद्याधरोंको ही यहां नमस्कार किया गया है। णमो चारणाणं ॥१७॥ चारण-ऋद्धिधारक जिनोंको नमस्कार हो ॥ १७ ॥ जल, जंघा, तन्तु, फल, पुष्प, बीज, आकाश और श्रेणीके भेदसे चारण-ऋद्धिधारक जिन आठ प्रकारके हैं। उनमें जो ऋषि जलकायिक जीवोंको पीड़ा न पहुंचाकर जलको न छूते हुए इच्छानुसार भूमिके समान जलसे ऊपरसे गमन कर सकते हैं वे जलचारण कहलाते हैं। इसी प्रकारसे जो साधु तन्तु, फल, फूल और बीजके ऊपरसे जा-आ सकते हैं उन्हें क्रमसे तन्तुचारण, फलचारण, पुष्पचारण और बीजचारण समझना चाहिये । भूमिमें पृथिवीकायिक जीवोंको बाधा न पहुंचा करके जो अनेक सौ योजन गमन कर सकते हैं वे जंघाचारण कहलाते हैं। धूम, अग्नि, पर्वत, वृक्ष और तन्तुसमूहके आश्रयसे जो ऋषि ऊपर चढनेकी शक्तिसे संयुक्त होते हैं वे श्रेणीचारण कहे जाते हैं। भूमिसे चार अंगुल ऊपर आकाशमें गमन करनेवाले ऋषि आकाशचारण कहलाते हैं। इन चारणऋषीश्वरोंकों यहां नमस्कार किया गया है । णमो पण्णसमणाणं ॥ १८ ॥ प्रज्ञाश्रमणोंको नमस्कार हो ॥ १८ ॥ औत्पत्तिकी, वैनयिकी, कर्मजा और परिणामिके भेदसे प्रज्ञा चार प्रकारकी है। इनमें पूर्व जन्मसम्बन्धी चार प्रकारकी निर्मल बुद्धिके बलसे विनयपूर्वक बारह अंगोंका अवधारण करके जो प्रथमतः देवोंमें और तत्पश्चात अविनष्ट संस्कारके साथ मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं वे वहां पढने, सुनने व पूछने आदिकी क्रियासे रहित होते हुए भी उक्त बुद्धिसे संयुक्त होते हैं उनकी वह बुद्धि औत्पत्तिकी कहलाती है। ऐसे औत्पत्तिप्रज्ञाश्रमण छह मासके उपवाससे कृश होते हुए भी उस बुद्धिके माहात्म्यको प्रकट करने के लिये पूछनेरूप क्रिया प्रवृत्त हुए चौदहपूर्वीको भी उत्तर देते हैं । विनयपूर्वक बारह अंगोंको पढ़नेवालेके जो बुद्धि उत्पन्न होती है उसका नाम वैनयिकी प्रज्ञा है, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org:
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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