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________________ ४५६ ] छक्खंडागमे खुद्दाबंधो [२, ११, १२३ मोसवचिजोगी संखेज्जगुणा ॥ १२३ ॥ बचिजोगी विसेसाहिया ॥ १२४ ॥ अजोगी अणंतगुणा ॥१२५॥ कम्मइयकायजोगी अणंतगुणा ॥१२६॥ ओरालियमिस्सकायजोगी असंखेज्जगुणा ॥ १२७ ॥ ओरालियकायजोगी संखेज्जगुणा ॥ १२८ ॥ कायजोगी विसेसाहिया ॥ १२९॥ आहारमिश्रकाययोगी सबसे स्तोक हैं ॥ १११ ॥ आहारमिश्रकाययोगियोंसे आहारकाययोगी संख्यातगुणे हैं ॥ ११२ ॥ आहारकाययोगियोंसे वैक्रियिकमिश्रकाययोगी असंख्यातगुणे हैं ॥११३ ॥ वैक्रियिकमिश्रकाययोगियोंसे सत्यमनोयोगी संख्यातगुणे हैं ॥ ११४ ॥ सत्यमनोयोगियोंसे मृषामनोयोगी संख्यातगुणे हैं ॥ ११५ ॥ मृषामनोयोगियोंसे सत्य-मृषामनोयोगी संख्यातगुणे हैं ॥ ११६ ॥ सत्य-मृषामनोयोगियोंसे असत्य-मृषामनोयोगी संख्यातगुणे हैं ॥ ११७ ॥ असत्यमृषामनोयोगियोंसे मनोयोगी विशेष अधिक हैं ॥ ११८ ॥ मनोयोगियोंसे सत्यवचनयोगी संख्यातगुणे हैं ॥ ११९ ॥ सत्यवचनयोगियोंसे मृषावचनयोगी संख्यातगुणे हैं ॥ १२० ॥ मृषावचनयोगियोंसे सत्यमृषावचनयोगी संख्यातगुणे हैं ॥ १२१॥ सत्यमृषावचनयोगियोंसे वैक्रियिककाययोगी संख्यातगुणे हैं ॥ १२२ ।। वैक्रियिककाययोगियोंसे असत्य-मृषावचनयोगी संख्यातगुणे हैं ॥ १२३॥ असत्यमृषावचनयोगियोंसे वचनयोगी विशेष अधिक हैं ॥ १२४ ॥ वचनयोगियोंसे अयोगी अनन्तगुणे हैं ॥ १२५ ॥ अयोगियोंसे कार्मणकाययोगी अनन्तगुणे हैं ॥ १२६ ॥ कार्मणकाययोगियोंसे औदारिकमिश्रकाययोगी असंख्यातगुणे हैं ॥१२७॥ औदारिकमिश्रकाययोगियोंसे औदारिककाययोगी संख्यातगुणे हैं ॥ १२८ ॥ औदारिककाययोगियोंसे काययोगी विशेष अधिक हैं ॥ १२९ ॥ वेदाणुवादेण सव्वत्थोवा पुरिसवेदा ॥१३०॥ इत्थिवेदा संखेज्जगुणा ॥१३१॥ अवगदवेदा अणंतगुणा ॥ १३२ ॥ णqसयवेदा अणंत गुणा ॥ १३३ ॥ वेदमार्गणाके अनुसार पुरुषवेदी सबसे स्तोक हैं ॥ १३० ॥ पुरुषवेदियोंसे स्त्रीवेदी संख्यातगुणे हैं ॥ १३१ ॥ स्त्रीवेदियोंसे अपगतवेदी अनन्तगुणे हैं ॥ १३२ ॥ अपगतवेदियोंसे नपुंसकवेदी अनन्तगुणे हैं ॥ १३३ ॥ इसी वेदमार्गणामें अन्य प्रकारसे भी अल्पबहुत्व कहा जाता हैपंचिंदियतिरिक्खजोणिएसु पयदं । सव्वत्थोवा सण्णिणqसयवेदगम्भोवतंतिया ॥ यहां पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती जीवोंका अधिकार है । संज्ञी नपुंसकवेदी गर्भोपकान्तिक जीव सबसे स्तोक हैं ॥ १३४ ॥ सण्णिपुरिसवेदा गब्भोवलिया संखज्जगुणा ॥ १३५ ॥ संज्ञी नपुंसक गर्भोपक्रान्तिकोंसे संज्ञी पुरुषवेदी गर्भोपक्रान्तिक संख्यातगुणे हैं ॥ १३५॥ सण्णिइत्थिवेदा गब्भोवकंतिया संखेज्जगुणा ॥ १३६ ॥ संज्ञी पुरुषवेदी गर्भोपक्रान्तिकोंसे संज्ञी स्त्रीवेदी गर्भोपक्रान्तिक संख्यातगुणे हैं ॥ १३६॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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