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________________ १,९-२, २३] जीवट्ठाण-चूलियाए ठाणसमुक्त्तिणं [ २७९ मोहणीयस्स कम्मस्स दस ठाणाणि- वावीसाए एक्कवीसाए सत्तारसण्हं तेरसण्हं णवण्हं पंचण्हं चदुण्हं तिण्हं दोण्हं एक्किसे हाणं चेदि ॥२०॥ मोहनीय कर्मके दस बन्धस्थान हैं- बाईस प्रकृतिरूप, इक्कीस प्रकृतिरूप, सत्तरह प्रकृतिरूप, तेरह प्रकृतिरूप, नौ प्रकृतिरूप, पांच प्रकृतिरूप, चार प्रकृतिरूप, तीन प्रकृतिरूप, दो प्रकृतिरूप और एक प्रकृतिरूप बन्धस्थान ॥ २० ॥ तत्थ इमं वावीसाए द्वाणं-मिच्छत्तं सोलस कसाया, इत्थिवेद-पुरिसवेद-णउंसयवेद तिण्हं वेदाणमेक्कदरं, हस्स-रदि अरदि-सोग दोण्हं जुगलाणमेक्कदरं, भय-दुगुंछा एदासिं वावीसाए पयडीणं एक्कम्हि चेव द्वाणं बंधमाणस्स ॥ २१॥ मोहनीय कर्मके उक्त दस बन्धस्थानोंमें बाईस प्रकृतिरूप बन्धस्थान यह है- मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धी आदि सोलह कषाय; स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसक वेद इन तीनों वेदोंमेंसे कोई एक वेद; हास्य और रति तथा अरति और शोक इन दोनों युगलों से कोई एक युगल; भय और जुगुप्सा; इन बाईस प्रकृतियोंके बांधनेवाले जीवका एक ही भावमें अवस्थान है ॥ २१ ॥ मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धिचतुष्क आदि सोलह कषाय, ये सत्तरह ध्रुवबन्धी प्रकृतियां हैं। कारण यह कि इनमें जिस प्रकार उदयकी अपेक्षा परस्परमें विरोध है उस प्रकार बन्धकी अपेक्षा परस्परमें विरोध नहीं है । इसीलिए सूत्रों इनके लिए एकतर' शब्दका प्रयोग नहीं किया गया है । स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद इन तीनों वेदोंका; तथा हास्य-रति और अरति-शोक इन दोनों युगलोंका उदयके समान बन्धके साथ भी विरोध है, यह बतलानेके लिए इनके साथमें 'एकतर ' शब्दका प्रयोग किया गया है । भय और जुगुप्सा इन दोनों प्रकृतियोंके साथमें भी जो 'एकतर' शब्दका प्रयोग नहीं किया गया है उससे इन दोनों प्रकृतियोंमें बन्धकी अपेक्षा कोई विरोध नहीं हैं, यह अभिप्राय ग्रहण करना चाहिये । इन बाईस प्रकृतियोंका एक ही भावमें अवस्थान होता है। तं मिच्छादिट्ठिस्स ॥ २२ ॥ वह बाईस प्रकृतिरूप मोहनीयका प्रथम बन्धस्थान मिथ्यादृष्टिके होता है ॥ २२ ॥ इसका कारण यह है कि मिथ्यात्वके उदययुक्त मिथ्यादृष्टि जीवको छोड़कर मिथ्यात्व प्रकृतिका अन्यत्र बन्ध नहीं होता है । इसलिये मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयसे संयुक्त इन बाईस प्रकृतियोंरूप बन्धस्थानका स्वामी मिथ्यादृष्टि जीव ही होता है । यहांपर बन्ध सम्बन्धी भंग छह (६) हैं । कारण यह कि एक जीवके विवक्षित समयमें तीन वेदोंमेंसे किसी एक ही वेदका तथा हास्यरति और अरति-शोक इन दो युगलोंमेंसे किसी एक ही युगलका बन्ध होता है । तत्थ इमं एकवीसाए हाणं-मिच्छत्तं णqसयवेदं वज ॥ २३ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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