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________________ १७२ ] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [१, ६, ७ सम्यग्मिथ्यादृष्टिका उत्कृष्ट अन्तर- नाना जीवोंके उत्कृष्ट अन्तरके योग्य सम्यग्मिथ्यात्वकालके बीत जानेपर सभी सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव सम्यक्त्वको अथवा मिथ्यात्वको प्राप्त हो गये । इस प्रकारसे सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थानका अन्तर प्राप्त हुआ। पुनः पत्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र उत्कृष्ट अन्तरकालके अनन्तर समयमें मोह कर्मकी अट्ठाईस प्रकृतियोंकी सत्तावाले मिथ्यादृष्टि अथवा वेदकसम्यम्दृष्टि अथवा उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सम्यग्मिथ्यात्वको प्रात हो गये। इस प्रकारसे सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थानका पत्योपमके असंख्यातवें भाग प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर प्राप्त हो जाता है। एगजी पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो, अंतोमुहुत्तं ॥ ७ ॥ एक जीवकी अपेक्षा सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंका जघन्य अन्तर क्रमशः पत्योपमके असंख्यातवें भाग और अन्तर्मुहूर्त होता है ॥ ७ ॥ सासादनसम्यग्दृष्टिका जघन्य अन्तर– उपशमसम्यक्त्वसे पीछे लौटा हुआ कोई एक सासादनसम्यग्दृष्टि जीव कुछ काल तक सासादन गुणस्थानमें रहा और फिर मिथ्यात्वको प्राप्त हो अन्तरको प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् पत्योपमक असंख्यातवें भाग मात्र कालमें फिरसे उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त होता हुआ उपशमसम्यक्त्वके कालमें छह आवली कालके अवशेष रहनेपर वह सासाइन गुणस्थानको प्राप्त हो गया। इस प्रकारसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग प्रमाण सासाइन गुणस्थानका अन्तरकाल उपलब्ध हो जाता है। सम्यग्मिथ्यादृष्टिका जघन्य अन्तर- एक सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव परिणामोंके निमित्तसे मिथ्यात्वको अथवा सम्यक्त्वको प्राप्त हो अन्तरको प्राप्त हुआ और अन्तर्मुहूर्त कालके पश्चात् ही पुनः सम्यग्मिथ्यात्वको प्रात हो गया। इस प्रकारसे अन्तर्मुहूर्त प्रमाण वह अन्तरकाल प्राप्त हो जाता है। उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टू देसूणं ॥ ८ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त दोनों गुणस्थानोंका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्ध पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण होता है ।। ८ ॥ सासादन गुणस्थानका उत्कृष्ट अन्तर- एक अनादि मिथ्यादृष्टि जीवने अधःप्रवृत्तादि तीनों करणोंको करके उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त होनेके प्रथम समयमें अनन्त संसारको अर्थ पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण किया । पुनः अन्तर्मुहूर्त काल सम्यक्त्वके साथ रहकर वह सासादनसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ। (१) पश्चात् मिथ्यात्वको प्राप्त होता हुआ अन्तरको प्राप्त हुआ और कुछ कम अर्ध पुद्गलपरिवर्तन काल तक मिथ्यात्वके साथ परिभ्रमण करके संसारके अन्तर्मुहूर्त मात्र शेष रह जानेपर उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ। पश्चात् उपशमसम्यक्त्वके कालमें एक समय शेष रह जानेपर सासा इन गुणस्थानको प्राप्त हुआ। इस प्रकारसे सूत्रोक्त अन्तरकाल प्राप्त हो गया। तत्पश्चात् वह फिरसे मिथ्यादृष्टि हुआ। (२) पुनः वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त होकर (३) अनन्तानुबन्धी कषायका विसंयोजन ( ४ ) और दर्शनमोहनीयका क्षय करके (५) अप्रमत्तसंयत हुआ। (६) पुनः Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org .
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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