________________
छक्खंडागमे जीवद्वाणं
[ १, ३, ९१
सासणसम्मादिट्ठी असंजदसम्मादिट्ठी अजोगिकेवली केवडिखेत्ते १ लोगस्स असंखेज्जदिभागे ।। ९१ ॥
१०० ]
अनाहारक सासादन सम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और अयोगिकेवली कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भागमें रहते हैं ॥ ९१ ॥
सजोगिकेवली केवडिखेत्ते ? लोगस्स असंखेज्जेसु वा भागेसु सव्वलोगे वा ॥ ९२ ॥ अनाहारक सयोगिकेवली भगवान् कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यात बहुभागों में और सर्व लोक में रहते हैं ॥ ९२ ॥
प्रतरसमुद्घातगत सयोगिकेवली जिन लोकके असंख्यात बहुभागों में रहते हैं, क्योंकि, वे लोकके चारों ओर स्थित वातवलयको छोड़कर शेष समस्त लोकके क्षेत्रको पूर्ण करके स्थित होते हैं । तथा लोकपूरणसमुद्घात में वे ही सयोगिकेवली जिन सर्व लोकमें रहते हैं, क्योंकि, उस समय सर्व लोकको पूर्ण करके स्थित होते हैं ।
॥ क्षेत्रानुयोगद्वार समाप्त हुआ ॥ ३ ॥
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org