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________________ [ ८९ १, ३, १२] खेत्ताणुगमे गदिमग्गणा आदेसेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइएसु मिच्छाइटिप्पहुडि जाव असंजदसम्माइहि त्ति केवडिखेत्ते ? लोगस्स असंखेजदिभागे ।। ५ ।। आदेशकी अपेक्षा गतिके अनुवादसे नरकगतिमें नारकियोंमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवी जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्रमें रहते हैं ॥ ५ ॥ एवं सत्तसु पुढवीसु णेरइया ।। ६ ।। इसी प्रकार सातों पृथिवियोंमें नारकी जीव लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्रमें रहते हैं । तिरिक्खगदीए तिरिक्खेसु मिच्छाइट्ठी केवडिखेत्ते ? सव्वलोए ।। ७ ॥ तिर्यंचगतिमें तिर्यंचोंमें मिथ्यादृष्टि जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? सर्व लोकमें रहते हैं ॥ ७ ॥ सासणसम्माइटिप्पहुडि जाव संजदासंजदा त्ति केवडिखेत्ते ? लोगस्स असंखेजदिभागे ।। ८ ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर संयतासंयत गुणस्थान तकके तिर्यंच जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्रमें रहते हैं ॥ ८ ॥ पंचिंदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्त-पंचिंदियतिरिक्खजोणिणीसु मिच्छाइढिप्पहुडि जाव संजदासजदा केवडिखेत्ते ? लोगस्स असंखेजदिभागे ॥ ९ ॥ पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त और पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती जीवोंमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती तिर्यंच कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्रमें रहते हैं ॥ ९॥ पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ता केवडिखेत्ते ? लोगस्स असंखेलदिभागे ॥ १०॥ पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्रमें रहते हैं ॥ १० ॥ ___ मणुसगदीए मणुस-मणुसपज्जत्त-मणुसिणीसु मिच्छाइट्टिप्पहुडि जाव अजोगिकेवली केवडिखेत्ते ? लोगस्स असंखेजदिभागे ।। ११ ।। मनुष्यगतिमें मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यनियोंमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवी जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्रमें रहते हैं ॥ ११ ॥ सजोगिकेवली केवडिखेत्ते ? ओघं ॥ १२ ॥ सयोगिकेवली कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? वे ओघप्ररूपणाके समान लोकके असंख्यातवें भागमें, लोकके असंख्यात बहुभागमें अथवा समस्त लोकमें रहते हैं ॥ १२॥ छ १२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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