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________________ १,२, १०] दव्वपमाणाणुगमे ओघणिद्देसो [५७ अप्पमत्तसंजदा दव्वपमाणेण केवडिया ? संखेज्जा ।। ८ ।। अप्रमत्तसंयत जीव द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने हैं ? संख्यात हैं ॥ ८ ॥ यद्यपि सूत्रमें आया हुआ — संखेज्जा' पद संख्याके जितने भी विकल्प हैं उन सबमें समान रूपसे पाया जाता है तो भी यहांपर उससे कोटिपृथक्त्वसे नीचेकी ही संख्या ग्रहण करनी चाहिये । कारण यह कि यहांपर पूर्वोक्त अर्थ इष्ट न होकर यदि कोटिपृथक्त्त्वरूप अर्थ ही इष्ट होता तो पूर्व सूत्रसे पृथक् इस सूत्रकी कोई आवश्यकता नहीं थी । दूसरे “ प्रमत्तसंयतके कालसे अप्रमत्तसंयतका काल संख्यातगुणा हीन है ” इस सूत्रसे भी जाना जाता है कि यहांपर कोटिपृथक्त्वरूप अर्थ इष्ट नहीं है। अब चारों उपशामकोंका द्रव्यप्रमाण बतलाने के लिये दो उत्तरसूत्र प्राप्त होते हैं-- चदुण्हमुवसामगा दव्वपमाणेण केवडिया ? पवेसण एक्को वा दो वा तिण्णि वा उक्कस्सेण चउवण्णं ।। ९॥ चारों गुणस्थानोंके उपशामक जीव द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने होते हैं ? प्रवेशकी अपेक्षा एक, अथवा दो, अथवा तीन; इस प्रकार उत्कृष्टरूपसे चौवन होते हैं ॥ ९॥ उपशमश्रेणीके प्रत्येक गुणस्थानमें एक समयमें चारित्रमोहनीयका उपशम करता हुआ जघन्यसे एक जीव प्रवेश करता है और उत्कृष्टरूपसे चौवन जीव प्रवेश करते हैं। यह सामान्य कथन है । विशेषकी अपेक्षा आठ समय अधिक वर्षपृथक्त्त्वके भीतर उपशमश्रेणीके योग्य आठ समय होते हैं। उनमेंसे प्रथम समयमें एक जीवको आदि लेकर उत्कृष्टरूपसे सोलह जीव उपशमश्रेणीपर चढते हैं । दूसरे समयमें एक जीवको आदि लेकर उत्कृष्टरूपसे चौबीस जीव उपशमश्रेणीपर चढते हैं। तीसरे समयमें एक जीवको आदि लेकर उत्कृष्टरूपसे तीस जीव उपशमश्रेणीपर चढ़ते हैं। चौथे समयमें एक जीवको आदि लेकर उत्कृष्टरूपसे छत्तीस जीव उपशमश्रेणीपर चढ़ते हैं। पांचवें समयमें एक जीवको आदि लेकर उत्कृष्ट रूपसे ब्यालीस जीव उपशमश्रेणीपर चढ़ते हैं। छठे समयमें एक जीवको आदि लेकर उत्कृष्टरूपसे अड़तालीस जीव उपशमश्रेणीपर चढ़ते हैं। सातवें और आठवें इन दो . समयोंमेंसे प्रत्येक समयमें एक जीवको आदि लेकर उत्कृष्टरूपसे चौवन जीव उपशमश्रेणीपर चढ़ते हैं। अब इन्हीं उपशामक जीवोंकी संख्याकी प्ररूपणा कालकी अपेक्षासे की जाती है.----. अद्धं पडुच्च संखेज्जा ॥ १० ॥ कालकी अपेक्षा उपशमश्रेणीमें संचित हुए सभी जीव संख्यात होते हैं ॥१०॥ पूर्वोक्त आठ समयोंके भीतर उपशमश्रेणीके प्रत्येक गुणस्थानमें उत्कृष्टरूपसे संचित हुए सम्पूर्ण जीवोंको एकत्रित करनेपर उनका प्रमाण तीन सौ चार ( १६+२४+३०+३६+४२+४८+ ५४+५४-३०४ ) होता है । छ ८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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