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________________ ५० ] सम्माट्ठी उवसमसम्माइट्ठी ॥ १६४ ॥ मनुष्य असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत गुणस्थानोंमें क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं ॥ १६४ ॥ अब मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यनियों में सम्यग्दर्शनभेदोंका प्रतिपादन करनेके लिये सूत्र कहते हैं छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [ १, १, १६४ एवं मणुसपञ्जत्त मणुसिणी || १६५ ॥ इसी प्रकार मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यनियोंमें जानना चाहिये ॥ १६५ ॥ अब देवगतिमें सम्यग्दर्शनका प्रतिपादन करनेके लिये सूत्र कहते हैंदेवा अस्थि मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी असजद सम्माइडि त्ति ॥ १६६ ॥ देव मिथ्यादृष्टि, सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि होते हैं ॥१६६ एवं जाव उवरिमउवरिमगेवेज विमाणवासियदेवाति ॥ १६७ ॥ इसी प्रकार उपरिमउपरिम ग्रैवेयक विमानवासी देवों तक जानना चाहिये ॥ १६७ ॥ अब देवोंमें सम्यग्दर्शनभेदोंका प्रतिपादन करनेके लिये आगे चार सूत्र कहे जाते हैंदेवा असंजदसम्मट्ठाणे अत्थि खइयसम्माइट्ठी वेदयसम्माइट्ठी उवसमसम्माट्ठिति ॥ १६८ ॥ देव असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानमें क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं ॥ १६८ ॥ भवणवासिय-वाणवेंतर- जोइसियदेवा देवीओ च सोधम्मीसाणककप्पवासियदेवीओ च असंजदसम्माइट्ठिट्ठाणे खइयसम्माइट्ठी णत्थि अवसेसा अस्थि अवसेसियाओ अस्थि ।। १६९ ॥ भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देव व उनकी देवियां तथा सौधर्म और ईशान कल्पवासिनी देवियां ये सब असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि नहीं होते हैं; शेष दो सम्यग्दर्शनोंसे युक्त होते हैं ॥ १६९ ॥ Jain Education International इसका कारण यह है कि इन सब देव - देवियोंमें दर्शनमोहनीयके क्षपणकी सम्भावना नहीं है तथा जिन जीवोंने पूर्व पर्यायमें उस दर्शनमोहनीयकी क्षपणा कर ली है उनकी उपर्युक्त देव-देवयम उत्पत्तिकी सम्भावना भी नहीं है । सोमीसाणपहुड जाव उवरिमउवरिमगेवेजविमाणवासियदेवा असंजदसम्माइट्ठट्ठाणे अत्थि खइयसम्माइडी वेदयसम्माइट्ठी उवसमसम्माइट्ठी ॥ १७० ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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