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________________ दिगम्बर जैन । [वर्ष १७ wwwmummonaamanna ३-उत्तम आर्जव । दुष्ट बुद्धिको दूर भगाकर माया जाल हटा दीजे जिससे आर्जव धर्म प्रगट हो, तिरिय योनिका बंध भजे (गे)॥ ४-उत्तम सत्य। सदा सत्य प्यारा ही बोलो, झूठ बचन तुम तज दीजे । जिससे सत्य धर्मका पालन-होवे, सत्से हृदय सजे ॥ ५-उत्तम शौच । अगनी जैसे ईधन पाकर, अपना वेग बढ़ा लेवे । तैसे तैसे लोभ पदारथ सुख, गुण, व्रत शम हरलेवे॥ लोभ पापका बाप कहाता इसको शीघ्रहि वश करले । तृष्णा छोड़ लोभको जीतो, जिससे शुचिता धर्म पले॥ ६-उत्तम संयम । पंचेन्द्रियके विषय छोड़कर मन बच तनसे रक्षा कर ॥ संयम धर्म धरो रुचिसेती पंच समितिका पालन कर ॥ ७-उत्तम तप । बारह विधिके तपके भाई, बाह्याभ्यन्तर भेद किए । शक्त्यनुसार सभीको पालो, दुर्गति मारग दूर किए ॥ ८-उत्तम त्याग। चार दान विख्यात जगतमें संघ चारको दे दीजे । जो है अमृतसम सुखकारी जिससे सब ही रोग नशे ॥ ०-उत्तम आकिंचन । जन्म मरणके नाश करनकी इच्छासे सब तज दीजे । परिग्रह चेतन और अचेतन जिससे चेतन धर्म सजे ॥ १०- उत्तम ब्रह्मचर्य । ब्रह्म शब्दका अर्थ आतमा जिसमें चर्या कर लीजे । किसीपै खोटी दृष्टि न करके मातृ बहिन सम समझोजे॥ शील रखनको महिमा भारो, जैन शास्त्रमें गाई है। इससे शील कभी ना छोड़ो, ताबिन व्रत नश जाई है। दामोदरदास जैन, चंदावाड़ी-सूरत ।
SR No.543201
Book TitleDigambar Jain 1924 Varsh 17 Ank 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMulchand Kisandas Kapadia
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1924
Total Pages42
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Digambar Jain, & India
File Size8 MB
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