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________________ दिगंबर जैन. * अंक १] देवीकी मूर्ति, सामने धरणेन्द्र यक्ष, वाम-भामें कुष्मांडनि देवकी मूर्ति और सामने सर्वाण्दय यक्ष हैं। इस त्रैविभागिक वस्ती - के आसपास में दोनों तरफके अत्यन्त मसृण प्रस्तरपट्टपर पैंतालिस पैंतालिस ऐतिहासिक चित्र खुदे हुए हैं । इन चित्रोंसे यह मालूम होता है कि, ये श्री १०८ भद्रबाहुस्वामी और महाराज चंद्रगुप्त के समय के शिल्पकला-संबंधी चित्र हैं; किन्तु अभी हमे इन चित्रोंका यथार्थ भाव नहीं ज्ञात हुआ है । मन्दिरका बाह्य दृश्य और शिखर पुरानी द्राविडी-पद्धतिसे बना है । मन्दिरके ऊपरके भागमें छोटे छोटे सिंह खुदे हुए हैं । ४—प्राकारके नैर्ऋत्य कोण में पूर्वाभिमुखका एक मन्दिर है । इसमें लगभग डेढ़ पुरुष ऊंची एक कायोत्सर्गस्थ सुरम्य श्री १००८ शान्तिनाथजीकी प्रतिमा है । इसके आगे एक मानस्तंभ है । इसके बगलमें एक धर्मशाला है, जिसमें यात्रिगण ठहरा करते हैं और पूजाकी सामग्री भी यहीं पर सुसम्पन्न करते हैं । इसके पासही में श्वेत चम्पकवृक्ष के नीचे लगभग डेढ़ पुरुष उंची एक बाहुबली स्वामीकी खण्डित प्रतिमा है। कहा जाता है कि, सांगोपांग सुसज्जित नहीं होने से इसकी स्थापना नहीं की गयी। ५-६. - वायव्य कोणमें पूर्वाभिमुख दो जिनमन्दिर हैं । एक मन्दिरमें श्री १००८ सुपार्श्वनाथजी की प्रतिमा विराज ७५ मान है और प्रतिमाके दोनों ओरसे दो इन्द्र चँवर ढुला रहे हैं । दूसरे में श्री १००८ चन्द्रप्रभु तीर्थंकर की प्रतिमा है। बाह्य भागमें यहां यक्ष और यक्षिणी की मूर्तियां हैं। नंबर ४-५-६ वांले मन्दिरोंके सामने चारों तरफ से खुले हुए कई छोटे छोटे मन्दिर हैं । उनमें बहुतसे शिलालेख खुदे हुए रक्षापूर्वक रखे गये हैं । इन शिलालेखोंमें प्राचीन जैनाचायोंके महत्वसूचक कई लेख हैं । ७ – नंबर ५ - -६ वाली वस्ती के सामने चामुण्डरायकी स्थापित एक अत्यन्त रमणीय भारतीय शिल्पकलाकी अत्युच्च प्रतिष्ठा रखनेवाली वस्ती है। इसमें श्री १००८ नेमिनाथ तीर्थंकर की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है । प्रतिमाके दोनों बगल में दो इंद्र चँवर ढुला रहे हैं । इंद्रों की देहपर आभूषण तथा वस्त्रादि इस कलाचातुरीसे खुदे हुए हैं कि, इनके सामने सच्चे गहने और कपड़े भी फीके पड़ जाते हैं । पछिका भामण्डल भी एक बड़े चिकने कृष्ण प्रस्तरपर अंकित है । यह शिल्पीय उत्कृष्टताका नमूना क्षणक्षण दग्गोचर कराता है । इसके पार्श्वमें यक्ष-यक्षीणीकी प्रतिमा बिराजमान है । इस मन्दिरकी प्रतिष्ठा श्रीमान् १०८ नेमिचंद्र सिद्धान्तचक्रवर्ति द्वारा की गयी है । इस मन्दिरका सभा मण्डप बहुत बड़ा है । इसके ऊपरका भाग ( कोठा ) चामु
SR No.543085
Book TitleDigambar Jain 1915 Varsh 08 Ank 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMulchand Kisandas Kapadia
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1915
Total Pages170
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Digambar Jain, & India
File Size19 MB
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